भारतीय मुसलमान अब किसी का राजनीतिक मोहरा नहीं बनेगा
राहुल गांधी, कांग्रेस और मुस्लिम राजनीतिक विश्वास का संकट
श्रृंखला — भाग 1


लेखक: अहमद सोहेल सिद्दीकी
भारत का मुसलमान देख रहा है।
और इस बार वह केवल नरेंद्र मोदी, भाजपा या आरएसएस को नहीं देख रहा। वह राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी और पूरी विपक्षी राजनीति की व्यवस्था को भी बेहद सावधानी और आलोचनात्मक दृष्टि से देख रहा है।
दशकों से मुस्लिम मतदाता से कहा जाता रहा है कि उसका राजनीतिक कर्तव्य बहुत सरल है:
भाजपा को रोकिए, हिंदुत्व को हराइए और कांग्रेस या उस पार्टी को वोट दीजिए जो भाजपा को हराने की स्थिति में हो।
लेकिन अब एक सवाल टालना मुश्किल होता जा रहा है:
आखिर भारतीय मुसलमानों को कब तक सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता रहेगा और सत्ता हासिल होने के बाद उन्हें किनारे किया जाता रहेगा?
मुस्लिम मतदाता अब केवल इसलिए अपना राजनीतिक विवेक छोड़ने को तैयार नहीं है कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता की बात करती है या राहुल गांधी राजनीतिक मंच से आरएसएस और हिंदुत्व पर हमला करते हैं।
सिर्फ शब्द पर्याप्त नहीं हैं।
मुसलमान सत्ता में हिस्सेदारी, प्रतिनिधित्व और संस्थागत गारंटी चाहता है—सिर्फ भाषण नहीं।

राहुल गांधी का सवाल
राहुल गांधी नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रमुख राष्ट्रीय चुनौतीकर्ता के रूप में उभरे हैं। आरएसएस, हिंदुत्व की राजनीति, बहुसंख्यकवाद और कथित संस्थागत कब्जे के खिलाफ उनके हमलों ने विपक्ष को एक अधिक स्पष्ट राजनीतिक भाषा दी है।
लेकिन मुस्लिम मतदाता को यह पूछने का पूरा अधिकार है:

अगर सत्ता की लड़ाई जीत ली गई तो मुसलमानों का क्या होगा?
क्या वे राजनीतिक साझेदार बने रहेंगे?
या एक बार फिर केवल चुनावी गणित बनकर रह जाएंगे?
चुनावों के दौरान मुस्लिम वोट महत्वपूर्ण हो जाता है। धर्मनिरपेक्षता एक केंद्रीय मुद्दा बन जाती है। नेता मस्जिदों, मदरसों और मुस्लिम इलाकों का दौरा करते हैं। मुस्लिम बुद्धिजीवियों और मध्यस्थों को बातचीत में शामिल किया जाता है।
लेकिन चुनाव के बाद प्रतिनिधित्व का सवाल अक्सर बिल्कुल अलग रूप ले लेता है।
और यही विश्वास के गहरे संकट का कारण है।
सिर्फ आरएसएस विरोधी बयान काफी नहीं
सार्वजनिक मंच से आरएसएस की आलोचना करना राजनीतिक रूप से आसान है।
मुश्किल सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल सांप्रदायिकता के खिलाफ अपने विरोध को संस्थागत रूप देने के लिए तैयार हैं?
अगर कांग्रेस वास्तव में मानती है कि आरएसएस-भाजपा का मॉडल भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के लिए खतरा है, तो उसका विरोध केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रह सकता।
उसे एक स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम बनना होगा।
प्रतिनिधित्व कहां है?
आंतरिक लोकतंत्र कहां है?
मुस्लिम नेतृत्व कहां है?
निर्णय लेने वाली संस्थाओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी कहां है?
और सबसे महत्वपूर्ण:
क्या यह गारंटी है कि मुसलमानों को फिर से रक्षात्मक ढंग से वोट देने के लिए कहा जाएगा और सत्ता मिलने के बाद दूसरे लोग उस सत्ता का लाभ उठाएंगे?

‘इरफान’ मॉडल मुसलमानों का राजनीतिक सशक्तीकरण नहीं
किसी एक मुस्लिम प्रवक्ता, बुद्धिजीवी, सलाहकार या मध्यस्थ की नियुक्ति अपने आप में कांग्रेस की मुस्लिम प्रतिबद्धता का प्रमाण नहीं बन सकती।
सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस अपना पक्ष रखने के लिए किसी इरफान को ढूंढ सकती है या नहीं।
सवाल यह है कि करोड़ों भारतीय मुसलमानों के पास कांग्रेस के भीतर वास्तविक निर्णयकारी शक्ति कितनी है।
टोकन प्रतिनिधित्व, प्रतिनिधित्व नहीं है।
टेलीविजन पर किसी मुस्लिम चेहरे की मौजूदगी मुस्लिम सशक्तीकरण नहीं है।
किसी मुस्लिम भाषण लेखक की मौजूदगी मुस्लिम राजनीतिक शक्ति नहीं है।
कहीं-कहीं मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा कर देना संस्थागत भागीदारी नहीं है।
प्रतिनिधित्व का अर्थ है—निर्णय लेने में भागीदारी, सत्ता के वितरण में हिस्सेदारी और जवाबदेही।
‘फिक्स्ड फाइट’ का सवाल
एक और असहज राजनीतिक सवाल है, जिसे विपक्ष केवल खारिज नहीं कर सकता।
अगर कांग्रेस सार्वजनिक रूप से आरएसएस और भाजपा को अपना वैचारिक विरोधी बताती है, लेकिन साथ ही भविष्य में राजनीतिक समझौते, बातचीत या किसी प्रकार के सामंजस्य की संभावनाओं के लिए रास्ते खुले रखती है, तो मुसलमानों को पूछने का अधिकार है:
क्या किसी संभावित राजनीतिक समझौते की कीमत फिर मुसलमानों को चुकानी पड़ेगी?
यह दावा कि राहुल गांधी या कांग्रेस गुप्त रूप से आरएसएस के साथ कोई समझौता कर रहे हैं, बिना प्रमाण के स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
लेकिन यह सवाल अपने आप में लोकतांत्रिक रूप से वैध है।
भारतीय राजनीति में मतभेद रखने वाले दल भी परिस्थितियों के अनुसार बातचीत और समझौते करते रहे हैं।
आज के राजनीतिक विरोधी कल के राजनीतिक साझेदार बन सकते हैं।
और जब ऐसा होता है, तो सवाल उठता है:
कीमत कौन चुकाता है?
अल्पसंख्यकों को यह डर अक्सर रहा है कि कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है।

कांग्रेस हमेशा मुस्लिम समर्थन की मांग नहीं कर सकती
कांग्रेस एक साथ यह नहीं कह सकती:
“हमें वोट दीजिए क्योंकि भाजपा खतरनाक है।”
और फिर यह उम्मीद करे कि मुसलमान बिना किसी शर्त के हमेशा उसका समर्थन करते रहें।
यह युग समाप्त होना चाहिए।
मुस्लिम मतदाता को अब रक्षात्मक मतदाता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जिसका एकमात्र उद्देश्य किसी दूसरे दल को हराना हो।
मुस्लिम मतदाता को सत्ता में हिस्सेदारी मांगने वाला मतदाता बनना होगा।
यह मांग लोकतंत्र-विरोधी नहीं है।
इसके विपरीत, यही लोकतंत्र का मूल है।

एक साहसिक प्रस्ताव: 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व
अगर कांग्रेस वास्तव में भारतीय मुसलमानों को विश्वास दिलाना चाहती है कि उसमें परिवर्तन आया है, तो उसे ऐतिहासिक आंतरिक सुधारों पर विचार करना चाहिए।
एक प्रस्ताव यह हो सकता है:
पार्टी के संगठनात्मक और उम्मीदवार चयन ढांचे में मुसलमानों को व्यापक और सुनिश्चित प्रतिनिधित्व दिया जाए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति रखते हैं।
इसके साथ:
- लोकसभा उम्मीदवारों के चयन में पर्याप्त मुस्लिम प्रतिनिधित्व;
- राज्यसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व;
- विधानसभा चुनावों में अधिक मुस्लिम उम्मीदवार;
- पार्टी संगठनों में मुस्लिम भागीदारी;
- नीति निर्धारण समितियों में मुस्लिम सदस्य;
- संसदीय नेतृत्व में मुस्लिम भागीदारी;
- और सांप्रदायिकता-विरोधी लिखित राजनीतिक घोषणा-पत्र।
हालांकि हर संस्था में 50 प्रतिशत धार्मिक आरक्षण की मांग गंभीर संवैधानिक और कानूनी प्रश्न पैदा करेगी और इसे केवल पार्टी के निर्णय से लागू नहीं किया जा सकता।
लेकिन मूल सिद्धांत—सार्थक और सुनिश्चित सत्ता-साझेदारी—पर गंभीर बहस होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री पद साझा करने का सवाल
यह प्रस्ताव कि प्रधानमंत्री का कार्यकाल अलग-अलग समुदायों के बीच समान रूप से बांटा जाए, अत्यंत विवादास्पद है।
भारत का संविधान प्रधानमंत्री पद को धार्मिक आधार पर बांटने की व्यवस्था नहीं करता।
प्रधानमंत्री संसदीय व्यवस्था के तहत लोकसभा में बहुमत के समर्थन से आता है।
इसलिए धार्मिक आधार पर तय प्रधानमंत्री व्यवस्था संवैधानिक रूप से लागू नहीं की जा सकती।
लेकिन इस प्रस्ताव के पीछे छिपे राजनीतिक सवाल को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता:
क्या कोई लोकतंत्र वास्तविक समावेश का दावा कर सकता है, यदि एक बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय लगातार कार्यपालिका के निर्णय लेने वाले केंद्रों में कम प्रतिनिधित्व रखता हो?
इसका संवैधानिक समाधान धार्मिक बंटवारा नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
लक्ष्य धार्मिक विभाजन नहीं, बल्कि समान नागरिकता होना चाहिए।
मुसलमानों को डर के आधार पर वोट देना बंद करना होगा
शायद यही सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
मुस्लिम मतदाता को यह पूछना बंद करना होगा:
“भाजपा को कौन हरा सकता है?”
और पूछना होगा:
“हमें सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी कौन देगा?”
यह पूरी तरह अलग राजनीतिक प्रश्न है।
अगर कांग्रेस मुस्लिम वोट चाहती है, तो उसे उसे अर्जित करना होगा।
अगर कोई दूसरी विपक्षी पार्टी मुस्लिम वोट चाहती है, तो उसे भी उसे अर्जित करना होगा।
अगर भाजपा मुस्लिम वोट चाहती है, तो उसे भी उसे अर्जित करना होगा।
किसी भी दल को केवल इसलिए मुस्लिम समर्थन का अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि दूसरा दल उससे अधिक खराब माना जाता है।
मुस्लिम वोट कांग्रेस की संपत्ति नहीं है।
न ही किसी क्षेत्रीय दल की।
न ही भाजपा की।
वह भारतीय नागरिक का वोट है—और उसका मालिक वही नागरिक है।
नया मुस्लिम राजनीतिक समझौता
भविष्य में मुसलमानों और राजनीतिक दलों के बीच संबंध एक स्पष्ट राजनीतिक समझौते पर आधारित होना चाहिए:
अंधी निष्ठा नहीं।
स्थायी राजनीतिक वफादारी नहीं।
टोकनवाद नहीं।
डर के आधार पर मतदान नहीं।
चुनावी ब्लैकमेल नहीं।
चुनाव के बाद उपेक्षा नहीं।
इसके बदले:
प्रतिनिधित्व।
जवाबदेही।
सत्ता में हिस्सेदारी।
संवैधानिक गारंटी।
राजनीतिक भागीदारी।
और ठोस परिणाम।
राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को चुनौती देने में सफल हों या नहीं।
कांग्रेस सत्ता में लौटे या नहीं।
भाजपा सत्ता में रहे या नहीं।
या भारत की राजनीति कोई बिल्कुल नया समीकरण पैदा करे।
एक बात बदलनी चाहिए:
भारतीय मुसलमान किसी और की सत्ता की लड़ाई में मोहरा बनकर नहीं रह सकता।
उसे खिलाड़ी बनना होगा।
क्योंकि अगर मुसलमान बार-बार सीढ़ी उपलब्ध कराता रहेगा और दूसरे लोग उस सीढ़ी से सत्ता तक पहुंचते रहेंगे, तो असली सवाल यह नहीं होगा कि चुनाव कौन जीता।
सवाल होगा:
सत्ता वास्तव में किसने हासिल की—और किसने केवल वोट दिए?
यही वह सवाल है जो भारतीय मुसलमानों को कांग्रेस समेत हर राजनीतिक दल से पूछना चाहिए।
मुस्लिम वोट अब किसी का ब्लैंक चेक नहीं है।
सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए—सिर्फ सत्ता बदलने का वादा नहीं
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मुस्लिम वोट अब ब्लैंक चेक नहीं
राहुल गांधी, कांग्रेस और मुस्लिम राजनीतिक विश्वास का अंतर्विरोध
श्रृंखला — भाग 2
लेखक: अहमद सोहेल सिद्दीकी
वह सवाल जिसे अब टाला नहीं जा सकता
भारतीय मुसलमान एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर पहुंच रहा है, जहां उसे अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में नए सिरे से सोचना होगा।
दशकों से चुनाव के समय उसके सामने एक ही सवाल रखा जाता रहा है:
“भाजपा को कौन हरा सकता है?”
लेकिन अब सवाल बदलना चाहिए:
“हमारे राजनीतिक अधिकारों और सत्ता में हिस्सेदारी की गारंटी कौन देगा?”
यह अंतर मामूली नहीं है।
एक समुदाय के पास करोड़ों वोट हो सकते हैं, लेकिन यदि उसके पास निर्णय लेने वाली संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो वह जरूरी नहीं कि राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो।
वह केवल चुनावी रूप से उपयोगी भी हो सकता है।
और यही भारतीय मुस्लिम राजनीति की सबसे बड़ी समस्या है।
राहुल गांधी का दौर
राहुल गांधी ने हाल के वर्षों में कांग्रेस की राजनीतिक भाषा को काफी हद तक बदला है।
आरएसएस, भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति और हिंदुत्व की विचारधारा के विरुद्ध उनका सार्वजनिक संघर्ष विपक्ष को एक स्पष्ट वैकल्पिक राजनीतिक कथा देता है।
मुसलमानों के लिए, हालांकि, यह केवल शुरुआत है।
असली परीक्षा संस्थागत होगी।
मान लीजिए कांग्रेस सत्ता में लौटती है।
तब क्या होगा?
क्या मुसलमानों को मंत्रिमंडल में वास्तविक प्रतिनिधित्व मिलेगा?
क्या मुस्लिम उम्मीदवारों को अधिक संख्या में जीतने योग्य लोकसभा सीटें मिलेंगी?
क्या पार्टी की सर्वोच्च निर्णयकारी संस्थाओं में मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ेगा?
क्या कांग्रेस संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए चुनावी परिस्थितियों से परे स्थायी प्रतिबद्धता करेगी?
या पुराना फार्मूला फिर लौट आएगा?
मुस्लिम वोट का इस्तेमाल भाजपा को हराने के लिए करो और उसके बाद सरकार मुस्लिम राजनीतिक भागीदारी के बिना चलाओ।
यही वह सवाल है जिसका जवाब राहुल गांधी और कांग्रेस को देना होगा।
इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता
भारतीय मुसलमानों के साथ कांग्रेस का संबंध लंबा और जटिल रहा है।
इसे यह कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस हमेशा मुसलमानों की मित्र रही है।
और इसे यह कहकर भी समाप्त नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस हमेशा मुसलमानों के खिलाफ रही है।
भारतीय राजनीतिक इतिहास इससे कहीं अधिक जटिल है।
कांग्रेस सरकारों ने ऐसे निर्णय लिए हैं जिनसे अल्पसंख्यकों को लाभ मिला और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता की रक्षा हुई।
लेकिन कांग्रेस सरकारों ने ऐसे निर्णय भी लिए जिन्होंने मुसलमानों के बीच गहरा अविश्वास पैदा किया।
शाह बानो प्रकरण, बाबरी मस्जिद विवाद का राजनीतिक प्रबंधन, 1986 में विवादित स्थल के ताले खुलना और राम जन्मभूमि आंदोलन के आसपास की राजनीतिक घटनाएं आज भी मुस्लिम राजनीतिक स्मृति का हिस्सा हैं।
इन घटनाओं की अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं।
लेकिन एक बात स्पष्ट है:
कांग्रेस के अपने फैसलों ने मुस्लिम राजनीतिक विश्वास को कई बार चोट पहुंचाई।
इसलिए आज केवल धर्मनिरपेक्षता का नाम लेना पर्याप्त नहीं हो सकता।
इतिहास का जवाब जवाबदेही से देना होगा।
बाबरी मस्जिद का सवाल
भारतीय मुसलमानों के लिए बाबरी मस्जिद केवल पुराना राजनीतिक विवाद नहीं है।
यह राजनीतिक असुरक्षा का प्रतीक बन चुका है।
विवादित ढांचा सदियों तक अस्तित्व में रहा।
राम जन्मभूमि आंदोलन ने इस मुद्दे को स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक आंदोलनों में बदल दिया।
6 दिसंबर 1992 का विध्वंस भारतीय राजनीति को स्थायी रूप से बदल गया।
कांग्रेस इस पूरे दौर के राजनीतिक वातावरण से अपने ऐतिहासिक संबंध को केवल भाजपा की आलोचना करके समाप्त नहीं कर सकती।
मुस्लिम सवाल आज भी यही है:
जब कांग्रेस के पास सत्ता और संवैधानिक अधिकार थे, तब उसने क्या किया?
यह प्रश्न वैध है।
इसका जवाब केवल आरएसएस पर एक और भाषण देकर नहीं दिया जा सकता।
इसका जवाब दस्तावेजों, फैसलों और जवाबदेही के माध्यम से देना होगा।
शाह बानो का सबक
शाह बानो प्रकरण एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक देता है।
1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो मामले में फैसला दिया।
इसके बाद राजीव गांधी सरकार ने 1986 में ऐसा कानून बनाया जिसने उस फैसले के प्रभाव को सीमित कर दिया।
इस घटना ने एक बुनियादी बात स्पष्ट की:
राजनीतिक तुष्टीकरण और राजनीतिक सशक्तीकरण एक ही चीज नहीं हैं।
किसी समुदाय को राजनीतिक रूप से खुश करने की कोशिश की जा सकती है, जबकि उसी समुदाय के पास स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णयकारी शक्ति बहुत कम हो।
यही अंतर आज समझना आवश्यक है।
मुसलमानों को ऐसी राजनीतिक पार्टी की आवश्यकता नहीं है जो केवल कहे:
“हम आपकी रक्षा करेंगे।”
उन्हें ऐसी राजनीतिक व्यवस्था चाहिए जिसमें मुसलमानों के पास अपने हितों की लोकतांत्रिक रक्षा करने के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व और संस्थागत शक्ति हो।
आरएसएस-विरोधी बयान पर्याप्त नहीं
यह राजनीतिक रूप से आसान है कि कोई नेता सार्वजनिक मंच से आरएसएस की आलोचना करे।
मुश्किल काम है यह सुनिश्चित करना कि सांप्रदायिकता-विरोधी प्रतिबद्धता सरकारी नीति और संस्थागत ढांचे में दिखाई दे।
यदि कांग्रेस वास्तव में मानती है कि आरएसएस-भाजपा मॉडल भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा है, तो उसे अपने विरोध को स्थायी कार्यक्रम बनाना चाहिए।
सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए:
“कौन भाजपा के खिलाफ बोलता है?”
सवाल होना चाहिए:
“कौन सत्ता में आने के बाद क्या करेगा?”
‘फिक्स्ड फाइट’ की परिकल्पना
राजनीतिक हलकों में कभी-कभी यह सवाल उठता है:
क्या कांग्रेस और भाजपा के बीच संघर्ष चुनावी स्तर पर वास्तविक है, लेकिन सत्ता-राजनीति में भविष्य में समझौते की गुंजाइश रखता है?
इसे स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता।
बिना दस्तावेजी प्रमाण के गुप्त बातचीत, राजनीतिक दूतों या किसी छिपे समझौते को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल अपने आप में वैध है।
भारतीय राजनीति में विरोधी दल भी परिस्थितियों के अनुसार बातचीत करते रहे हैं।
इसलिए मुसलमानों को एक सिद्धांत स्पष्ट करना चाहिए:
ऐसा कोई राजनीतिक समझौता, जो संवैधानिक अधिकारों या अल्पसंख्यक सुरक्षा को प्रभावित करे, मुसलमानों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
कोई गुप्त समझौता नहीं।
कोई अनौपचारिक सौदा नहीं।
संवैधानिक अधिकारों पर कोई राजनीतिक समझौता नहीं।
कांग्रेस की असली परीक्षा
यदि कांग्रेस वास्तव में भारतीय मुसलमानों के साथ अपने संबंधों को नया रूप देना चाहती है, तो उसे अपने वादों को मापने योग्य बनाना होगा।
भावनात्मक नहीं।
सिर्फ भाषणात्मक नहीं।
मापने योग्य।
कांग्रेस को सार्वजनिक करना चाहिए:
1. संगठन में मुस्लिम प्रतिनिधित्व
कितने मुसलमान वास्तविक निर्णयकारी पदों पर हैं?
2. मुस्लिम उम्मीदवार
कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट मिलता है?
और अधिक महत्वपूर्ण:
कितने को जीतने योग्य सीटें मिलती हैं?
3. संसदीय प्रतिनिधित्व
कांग्रेस के संसदीय नेतृत्व में कितने मुसलमान हैं?
4. मंत्रिमंडलीय प्रतिनिधित्व
कांग्रेस की सरकार बनने पर अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के क्या सिद्धांत होंगे?
5. राज्य स्तर पर प्रतिनिधित्व
विधानसभाओं और राज्य सरकारों में मुस्लिम भागीदारी बढ़ाने की क्या नीति होगी?
6. नीति निर्माण
अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर कांग्रेस की नीतियां बनाने में कितने मुसलमान भाग लेते हैं?
7. सांप्रदायिकता-विरोधी व्यवस्था
क्या कांग्रेस सांप्रदायिक हिंसा और भेदभाव की निगरानी के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाएगी?
8. जवाबदेही
क्या कांग्रेस हर वर्ष अल्पसंख्यकों के प्रति अपने वादों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करेगी?
यही ठोस सवाल हैं।
50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की मांग
कांग्रेस के भीतर 50 प्रतिशत मुस्लिम प्रतिनिधित्व की मांग जानबूझकर एक साहसिक और बहस पैदा करने वाला प्रस्ताव है।
इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
हर निर्वाचित संस्था में धर्म के आधार पर 50 प्रतिशत आरक्षण संवैधानिक और कानूनी प्रश्न पैदा करेगा।
लेकिन कांग्रेस अपने आंतरिक राजनीतिक ढांचे में बड़े बदलाव कर सकती है।
वह पारदर्शी प्रतिनिधित्व लक्ष्य निर्धारित कर सकती है।
वह उम्मीदवार चयन में मुस्लिम भागीदारी बढ़ा सकती है।
वह यह सार्वजनिक कर सकती है कि मुस्लिम उम्मीदवारों को कितनी वास्तविक और जीतने योग्य सीटें दी गईं।
इससे बहस बदल जाएगी।
आज सवाल होता है:
“क्या कांग्रेस मुसलमानों का समर्थन करती है?”
कल सवाल होना चाहिए:
“कांग्रेस ने मुसलमानों को वास्तविक राजनीतिक शक्ति कितनी दी?”
यही संरक्षण और सशक्तीकरण के बीच अंतर है।
प्रधानमंत्री पद का सवाल
प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच बराबर बांटने का प्रस्ताव राजनीतिक रूप से बेहद साहसिक है, लेकिन संवैधानिक रूप से गंभीर कठिनाइयां पैदा करता है।
भारत का संविधान प्रधानमंत्री पद का धार्मिक आधार पर रोटेशन नहीं करता।
प्रधानमंत्री संसदीय बहुमत और लोकसभा के समर्थन से बनता है।
इसलिए प्रधानमंत्री पद का धार्मिक कोटा संवैधानिक व्यवस्था में सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल महत्वपूर्ण है:
क्या कोई लोकतंत्र वास्तविक समावेश का दावा कर सकता है, जब एक बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय बार-बार कार्यपालिका के निर्णयकारी केंद्रों में कम प्रतिनिधित्व पाए?
इसका समाधान धार्मिक विभाजन नहीं होना चाहिए।
समाधान होना चाहिए:
व्यापक प्रतिनिधित्व।
समान नागरिकता।
समान राजनीतिक भागीदारी।
मुसलमानों को डर के आधार पर मतदान बंद करना होगा
यह सबसे बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हो सकता है।
मुस्लिम मतदाता को यह पूछने से आगे बढ़ना होगा:
“भाजपा को कौन हरा सकता है?”
और पूछना होगा:
“कौन हमें सत्ता में वास्तविक भागीदारी देगा?”
अगर कांग्रेस मुस्लिम वोट चाहती है, तो उसे वह वोट अर्जित करना होगा।
अगर कोई क्षेत्रीय दल चाहता है, तो उसे भी अर्जित करना होगा।
अगर भाजपा मुस्लिम वोट चाहती है, तो उसे भी अर्जित करना होगा।
किसी भी दल को केवल इसलिए मुस्लिम वोट का स्वाभाविक अधिकार नहीं मिल सकता कि दूसरा दल उससे अधिक खराब माना जाता है।
मुस्लिम वोट कांग्रेस की संपत्ति नहीं है।
वह किसी क्षेत्रीय दल की संपत्ति नहीं है।
वह किसी धार्मिक नेता की संपत्ति नहीं है।
वह भारतीय मुसलमान नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है।
वोट बैंक से सत्ता के साझेदार तक
लक्ष्य कांग्रेस के लिए नया मुस्लिम वोट बैंक बनाना नहीं होना चाहिए।
लक्ष्य होना चाहिए:
मुसलमानों को वोट बैंक से स्वतंत्र लोकतांत्रिक राजनीतिक शक्ति में बदलना।
ऐसी शक्ति जो:
कांग्रेस से बातचीत कर सके।
क्षेत्रीय दलों से बातचीत कर सके।
भाजपा से भी सवाल पूछ सके।
जिससे भी समर्थन मांगा जाए, उससे अपने अधिकारों की मांग कर सके।
लेकिन साथ ही:
संवैधानिक मूल्यों को छोड़े बिना।
राष्ट्रीय एकता को छोड़े बिना।
लोकतांत्रिक सिद्धांतों को छोड़े बिना।
और सबसे महत्वपूर्ण:
अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता छोड़े बिना।
राहुल गांधी के लिए संदेश
राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी और आरएसएस को चुनौती देने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन यदि वे चाहते हैं कि भारतीय मुसलमान उनके साथ खड़ा हो, तो उन्हें एक सरल प्रश्न का उत्तर देना होगा:
“भाजपा से सुरक्षा के अलावा मुसलमानों को क्या मिलेगा?”
क्योंकि सुरक्षा सत्ता नहीं है।
प्रतिनिधित्व सत्ता है।
भागीदारी सत्ता है।
निर्णय लेने की क्षमता सत्ता है।
जवाबदेही सत्ता है।
संवैधानिक नागरिकता सत्ता है।
कांग्रेस के लिए संदेश
कांग्रेस को इस मांग से डरना नहीं चाहिए।
उसे इसका स्वागत करना चाहिए।
यदि कांग्रेस वास्तव में मानती है कि भारत का भविष्य बहुसंख्यकवादी राजनीति को रोकने में है, तो उसे दिखाना होगा कि वह ऐसा राजनीतिक विकल्प बना सकती है जिसमें अल्पसंख्यक केवल सुरक्षित न हों, बल्कि निर्णय लेने में भागीदार भी हों।
अन्यथा टोकनवाद का आरोप बना रहेगा।
मुसलमानों के लिए संदेश
भारतीय मुसलमानों को किसी राजनीतिक उद्धारकर्ता की तलाश बंद करनी होगी।
उन्हें किसी पार्टी का स्थायी राजनीतिक अनुचर बनने से भी इनकार करना होगा।
उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों का एजेंडा स्वयं तय करना होगा।
प्रतिनिधित्व मांगिए।
जवाबदेही मांगिए।
सत्ता में भागीदारी मांगिए।
संवैधानिक सुरक्षा मांगिए।
और वोट देने से पहले परिणाम मांगिए।
अंतिम सवाल
दशकों से भारतीय मुसलमानों से कहा गया:
“अगर आपने हमें वोट नहीं दिया तो भाजपा आ जाएगी।”
यह तर्क अभी भी चुनावों को प्रभावित कर सकता है।
लेकिन नई पीढ़ी पूछ रही है:
“अगर हम आपको वोट दें, तो हमें क्या मिलेगा?”
यह कांग्रेस-विरोधी सवाल जरूरी नहीं है।
यह भाजपा-समर्थक सवाल भी नहीं है।
यह लोकतंत्र का सवाल है।
और कांग्रेस को इसका जवाब देना चाहिए।
क्योंकि नरेंद्र मोदी को हराना कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है।
यह केवल एक चुनावी उद्देश्य है।
असली सवाल है:
उसके बाद भारत कैसा होगा?
और उस भारत में भारतीय मुसलमानों की हिस्सेदारी कितनी होगी?
मुस्लिम वोट किसी का ब्लैंक चेक नहीं।
डर के आधार पर कोई स्थायी जनादेश नहीं।
टोकन प्रतिनिधित्व नहीं।
सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी—या फिर वोट क्यों?
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कांग्रेस–मुस्लिम राजनीतिक हिसाब-किताब
1947–2026: वादे, फैसले, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक वफादारी की कीमत
श्रृंखला — भाग 3
लेखक: अहमद सोहेल सिद्दीकी
यह आरोप-पत्र नहीं, राजनीतिक ऑडिट है
अगर भारतीय मुसलमान कांग्रेस के साथ अपने राजनीतिक संबंधों पर पुनर्विचार करना चाहते हैं, तो यह काम मिथकों के आधार पर नहीं, प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
कांग्रेस का मूल्यांकन केवल उसके आलोचकों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
और न ही केवल उसके समर्थकों के आधार पर।
उसका रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए।
उसके वादों की तुलना उसके फैसलों से होनी चाहिए।
उसकी बयानबाजी की तुलना उसके प्रतिनिधित्व से होनी चाहिए।
और मुसलमानों के प्रति उसके रवैये को केवल इस सवाल से नहीं परखा जाना चाहिए:
“क्या कांग्रेस ने भाजपा का विरोध किया?”
बल्कि इससे:
“जब कांग्रेस के पास राजनीतिक सत्ता थी, तब उसने भारतीय मुसलमानों के लिए वास्तव में क्या किया?”
यही इस राजनीतिक हिसाब-किताब का उद्देश्य है।
1947–1984
कांग्रेस के प्रभुत्व का दौर
स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक कांग्रेस भारत की प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति रही।
उसके राजनीतिक गठबंधन में मुसलमानों सहित बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यक समुदाय शामिल रहे।
कांग्रेस का मॉडल धार्मिक बहुसंख्यकवाद के बजाय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद पर आधारित होने का दावा करता था।
विभाजन के बाद के भारत में मुसलमानों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।
लेकिन चुनावी निर्भरता और राजनीतिक सशक्तीकरण दो अलग चीजें हैं।
इसलिए इस दौर का पहला सवाल होना चाहिए:
क्या कांग्रेस ने मुसलमानों को सत्ता का बराबर साझेदार बनाया—या मुख्यतः एक भरोसेमंद चुनावी आधार के रूप में देखा?
इसका उत्तर किसी एक आंकड़े में नहीं दिया जा सकता।
कांग्रेस सरकारों ने अल्पसंख्यकों के लिए शिक्षा, कल्याण और प्रतिनिधित्व से जुड़ी नीतियां भी अपनाईं।
लेकिन सार्वजनिक रोजगार और राजनीतिक संस्थाओं के अनेक क्षेत्रों में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम बना रहा।
आखिरकार यह स्थिति इतनी गंभीर बनी कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सच्चर समिति गठित की, जिसने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का व्यापक अध्ययन किया।
यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण था।
क्योंकि इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल चुनावी प्रतिनिधित्व अपने आप में सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण सुनिश्चित नहीं करता।
1984
वह वर्ष जिसने राजनीतिक सुरक्षा के मिथक को तोड़ दिया
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में सिख-विरोधी हिंसा हुई।
मुस्लिम राजनीतिक प्रश्न के संदर्भ में यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
जो राजनीतिक दल धर्मनिरपेक्ष भारत का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, उसे इस बात से परखा जाना चाहिए कि जब किसी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला हो तो वह क्या करता है।
1984 की हिंसा स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे अंधकारमय अध्यायों में से एक बनी हुई है।
इससे एक व्यापक सबक भी मिलता है।
सिख हों, मुसलमान हों, ईसाई हों या कोई अन्य अल्पसंख्यक—
केवल राजनीतिक आश्वासन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
संस्थागत जवाबदेही आवश्यक है।
संवैधानिक अधिकारों को राजनीतिक संरक्षण के बदले कभी नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
1986
शाह बानो: जब राज्य राजनीतिक संघर्ष का मैदान बना
शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं के भरण-पोषण और मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा किया।
इसके बाद राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया।
इस घटना की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं हैं।
एक पक्ष ने इसे रूढ़िवादी मुस्लिम नेतृत्व के दबाव में किया गया तुष्टीकरण बताया।
दूसरे पक्ष ने इसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की स्वायत्तता की रक्षा के प्रयास के रूप में देखा।
लेकिन इससे एक बड़ा राजनीतिक सबक निकलता है:
मुसलमानों को राजनीतिक रूप से खुश करना और मुसलमानों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना एक ही चीज नहीं है।
एक समुदाय को चुनावी राजनीति में लुभाया जा सकता है, जबकि उसके पास स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति बहुत कम हो।
आज के लिए सबक स्पष्ट होना चाहिए:
भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक भविष्य का फैसला राजनीतिक अभिजात वर्ग और मध्यस्थों के बंद कमरों में नहीं होना चाहिए।
1986
बाबरी मस्जिद: ताले खुले
फरवरी 1986 में विवादित बाबरी मस्जिद/राम जन्मभूमि स्थल के ताले खुलने की घटना भारतीय राजनीति का एक निर्णायक मोड़ बनी।
इसके बाद एक राजनीतिक कथा विकसित हुई कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक संतुलन के लिए ताले खुलवाने में भूमिका निभाई।
लेकिन ऐतिहासिक जवाबदेही के लिए सावधानी आवश्यक है।
बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह ने इस लोकप्रिय धारणा पर सवाल उठाया कि राजीव गांधी को ताले खुलने की जानकारी पहले से थी।
इसलिए एक गंभीर जांच को अलग-अलग सवालों को अलग रखना चाहिए:
क्या हुआ?
आदेश किसने दिया?
किसे पहले से जानकारी थी?
किसे राजनीतिक लाभ मिला?
और:
उसके बाद क्या हुआ?
इन सभी सवालों का उत्तर एक जैसा होना जरूरी नहीं है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है:
इस घटना ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
1989
अयोध्या राष्ट्रीय चुनावी राजनीति के केंद्र में
1980 के दशक के अंत तक अयोध्या राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन चुका था।
कांग्रेस की स्थिति भारी राजनीतिक दबाव के बीच बदलती रही।
वह न तो भाजपा के उभरते हिंदुत्व आंदोलन को पूरी तरह स्वीकार कर सकती थी और न ही अयोध्या को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र से रोक पाने में सफल रही।
इससे एक नई राजनीतिक स्थिति पैदा हुई:
कांग्रेस भाजपा से चुनावी मुकाबला कर रही थी, लेकिन राजनीतिक वातावरण तेजी से भाजपा की विचारधारा से प्रभावित हो रहा था।
मुसलमानों के लिए सवाल था:
अगर कांग्रेस अपने प्रतिद्वंद्वी द्वारा बनाए गए राजनीतिक एजेंडे के दबाव में आ रही है, तो मुस्लिम राजनीतिक हितों की रक्षा कौन करेगा?
1992
बाबरी मस्जिद विध्वंस
6 दिसंबर 1992 आधुनिक भारतीय राजनीति की सबसे निर्णायक तारीखों में से एक है।
विवादित ढांचा गिरा दिया गया।
राज्य की मौजूदगी और सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए आश्वासनों के बावजूद यह घटना हुई।
लिब्रहान आयोग ने विध्वंस की परिस्थितियों की जांच की।
इसके राजनीतिक परिणाम अत्यंत व्यापक थे।
लेकिन मुसलमानों के लिए इसका सबसे बड़ा सबक था:
राजनीतिक आश्वासन संवैधानिक और भौतिक सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकते।
यही कारण है कि आज कांग्रेस के वादों को भाषणों से नहीं, बल्कि संस्थागत सुरक्षा के उपायों से परखा जाना चाहिए।
1992–2004
नए राजनीतिक फार्मूले की तलाश
बाबरी मस्जिद विध्वंस ने भारतीय राजनीति को बदल दिया।
भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में लगातार मजबूत हुई।
कांग्रेस ने स्वयं को प्रमुख धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
इसके परिणामस्वरूप मुस्लिम मतदान तेजी से रक्षात्मक होता गया।
सवाल बदल गया:
पहले:
“मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कौन करता है?”
बाद में:
“भाजपा को कौन हरा सकता है?”
यहीं से आधुनिक डर-आधारित चुनावी समझौते की शुरुआत हुई।
और जब यह व्यवस्था मजबूत होती गई, तो मुस्लिम राजनीतिक सौदेबाजी की शक्ति paradoxically कम होती गई।
क्यों?
क्योंकि यदि किसी राजनीतिक दल को विश्वास हो कि एक समुदाय केवल दूसरे दल को रोकने के लिए उसे वोट देगा, तो उसे वास्तविक सत्ता-साझेदारी देने का दबाव कम हो जाता है।
2004–2014
यूपीए का प्रयोग
कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने यह परखने का महत्वपूर्ण अवसर दिया कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति को क्या वास्तविक अल्पसंख्यक सशक्तीकरण में बदला जा सकता है।
सरकार ने सच्चर समिति गठित की।
इस समिति ने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन किया।
यह महत्वपूर्ण कदम था।
क्योंकि पहली बार राज्य ने व्यापक स्तर पर यह स्वीकार किया कि मुस्लिम प्रश्न केवल सांप्रदायिक या चुनावी प्रश्न नहीं है।
यह भी है:
शिक्षा का प्रश्न।
आर्थिक विकास का प्रश्न।
रोजगार का प्रश्न।
प्रशासनिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न।
राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न।
और:
संस्थागत पहुंच का प्रश्न।
लेकिन इससे एक और प्रश्न पैदा हुआ:
अगर कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को मुस्लिम पिछड़ेपन की गंभीरता का पता था, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व इतना कमजोर क्यों बना रहा?
सच्चर समिति का सबक
सच्चर समिति ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने रखा।
मुसलमान इतने राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण थे कि वे चुनावों को प्रभावित कर सकते थे।
लेकिन अनेक शक्तिशाली संस्थानों में उनकी उपस्थिति अनुपातहीन रूप से कम थी।
यही भारतीय मुस्लिम राजनीति की मूल समस्या है।
वोट की ताकत और सत्ता की ताकत एक ही चीज नहीं हैं।
समाधान केवल कल्याणकारी योजनाएं नहीं हो सकता।
समाधान में शामिल होना चाहिए:
प्रतिनिधित्व + शिक्षा + रोजगार + राजनीतिक शक्ति + संस्थागत पहुंच।
अन्यथा हर चुनाव मुस्लिम राजनीतिक संबंध को फिर से शून्य पर ले आता है।
2012
4.5 प्रतिशत उप-कोटा विवाद
यूपीए सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे के भीतर अल्पसंख्यकों के लिए 4.5 प्रतिशत उप-कोटा देने के प्रस्ताव ने एक बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा किया।
समर्थकों ने इसे पिछड़े मुस्लिम समुदायों की स्थिति सुधारने का प्रयास बताया।
आलोचकों ने इसे चुनावी राजनीति से प्रेरित और कानूनी रूप से कमजोर बताया।
स्थिति चाहे जो हो, इस घटना ने एक स्थायी समस्या को सामने रखा:
चुनाव के करीब घोषित नीतियां आसानी से चुनावी रणनीति के रूप में देखी जाती हैं।
अगर कांग्रेस मुस्लिम विश्वास वापस हासिल करना चाहती है, तो उसे अस्थायी चुनावी घोषणाओं की जगह दीर्घकालीन संस्थागत नीति अपनानी होगी।
2014
राजनीतिक भूकंप
2014 के लोकसभा चुनाव ने भारतीय राजनीति को बदल दिया।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लोकसभा में बहुमत हासिल किया।
कांग्रेस को ऐतिहासिक पराजय का सामना करना पड़ा।
मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव उन दलों की ओर और अधिक बढ़ा जो भाजपा उम्मीदवारों को हराने की स्थिति में थे।
इससे एक विरोधाभास पैदा हुआ:
मुस्लिम वोट चुनावी रूप से महत्वपूर्ण होता गया, लेकिन मुस्लिम राजनीतिक सौदेबाजी की शक्ति उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।
कोई समुदाय दर्जनों सीटों के परिणाम तय कर सकता है और फिर भी राष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में उसके पास उतनी शक्ति न हो।
यही मुस्लिम वोट का विरोधाभास है।
2014–2024 ul
रक्षात्मक मतदान का युग
मोदी युग में कांग्रेस ने स्वयं को भाजपा के प्रमुख राष्ट्रीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
मुसलमानों के सामने एक कठिन राजनीतिक दुविधा बनी।
चुनावी विकल्प तेजी से बदलकर:
कांग्रेस/इंडिया बनाम भाजपा/एनडीए
जैसा हो गया।
लेकिन इस द्विध्रुवीय राजनीति के नीचे मुस्लिम समुदाय का अपना स्वतंत्र राजनीतिक एजेंडा अक्सर दब गया।
भाजपा के आलोचक कहते:
“हिंदुत्व को रोकने के लिए कांग्रेस को वोट दीजिए।”
मुस्लिम मतदाता का सवाल होना चाहिए:
“कांग्रेस जीत गई तो हमारे लिए क्या बदलेगा?”
यही सवाल धीरे-धीरे महत्वपूर्ण होता गया।
2024
आंकड़े एक कहानी बताते हैं
2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम सांसदों की संख्या 24 रही।
रिपोर्टों के अनुसार यह लोकसभा का लगभग 4.4 प्रतिशत था, जबकि भारत की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत है।
यह तथ्य अपने आप में एक गंभीर लोकतांत्रिक प्रश्न पैदा करता है:
भारत की आबादी के लगभग सातवें हिस्से का प्रतिनिधित्व संसद में इतना कम क्यों है?
और कांग्रेस से एक दूसरा सवाल भी पूछा जाना चाहिए:
उसने कितने मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे?
और उससे भी महत्वपूर्ण:
कितनों को वास्तव में जीतने योग्य सीटें दीं?
यही आंकड़े महत्वपूर्ण हैं।
न कि मुस्लिम प्रवक्ताओं की संख्या।
न मुस्लिम सम्मेलनों की संख्या।
न धर्मनिरपेक्षता पर दिए गए भाषणों की संख्या।
उम्मीदवार।
जीतने योग्य सीटें।
जीत।
नेतृत्व के पद।
यही वास्तविक प्रतिनिधित्व है।
2026
राजनीतिक चेतावनी
आज का राजनीतिक वातावरण मुस्लिम वोट को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना रहा है।
हाल के चुनावी परिणाम बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इससे एक असाधारण राजनीतिक अवसर पैदा होता है।
लेकिन इसके साथ खतरा भी है।
कांग्रेस फिर से मुस्लिम चुनावी निर्भरता को मुस्लिम राजनीतिक संतुष्टि समझने की गलती कर सकती है।
ये दोनों एक चीज नहीं हैं।
राजनीतिक हिसाब-किताब
| अवधि | कांग्रेस की स्थिति/कार्रवाई | मुस्लिम राजनीतिक सवाल |
|---|---|---|
| 1947–84 | धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी राजनीतिक ढांचा | क्या चुनावी समावेशन संस्थागत प्रतिनिधित्व में बदला? |
| 1985–86 | शाह बानो विवाद और कानून | क्या मुस्लिम महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक आवाज मिली? |
| 1986 | बाबरी मस्जिद के ताले खुले | किसे जानकारी थी, निर्णय किसने लिया और राजनीतिक लाभ किसे मिला? |
| 1989–92 | अयोध्या राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में | क्या कांग्रेस संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता की पर्याप्त रक्षा कर सकी? |
| 1992 | बाबरी मस्जिद विध्वंस | राजनीतिक आश्वासन विफल क्यों हुए? |
| 2004–14 | यूपीए और सच्चर समिति | ज्ञात पिछड़ेपन के बावजूद प्रतिनिधित्व क्यों कमजोर रहा? |
| 2012 | 4.5% अल्पसंख्यक उप-कोटा | संरचनात्मक सुधार या चुनावी राजनीति? |
| 2014–24 | कांग्रेस प्रमुख भाजपा-विरोधी विकल्प बनी | क्या रक्षात्मक मुस्लिम मतदान सत्ता-साझेदारी में बदला? |
| 2024 | केवल 24 मुस्लिम सांसद | संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है? |
| 2026 | कांग्रेस को अब भी महत्वपूर्ण मुस्लिम समर्थन | क्या चुनावी निर्भरता अंततः राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलेगी? |
इस हिसाब-किताब में भाजपा भी शामिल होनी चाहिए
एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होनी चाहिए।
यह जांच कांग्रेस को एक मानक पर रखकर भाजपा को उससे मुक्त नहीं कर सकती।
यदि सिद्धांत यह है:
“किसी पार्टी को मुस्लिम वोट का मालिकाना हक नहीं है।”
तो यह सिद्धांत सब पर लागू होगा।
भाजपा को भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व, उम्मीदवार चयन, सांप्रदायिक बयानबाजी और अल्पसंख्यक भागीदारी के सवालों का जवाब देना होगा।
क्षेत्रीय दलों को भी।
मुस्लिम राजनीतिक दलों को भी।
और मुस्लिम नेताओं को भी।
क्योंकि:
राजनीतिक जवाबदेही केवल कांग्रेस के दरवाजे पर समाप्त नहीं हो सकती।
सबसे बड़ी विफलता: मुस्लिम राजनीतिक बिचौलिए
इस जांच का शायद सबसे असहज हिस्सा मुस्लिम राजनीतिक मध्यस्थों से संबंधित है।
दशकों से राजनीतिक दलों ने भरोसा किया है:
- धार्मिक नेताओं पर,
- मुस्लिम संगठनों पर,
- बुद्धिजीवियों पर,
- पत्रकारों पर,
- स्थानीय राजनीतिक बिचौलियों पर,
- उलेमा पर,
- राजनीतिक मध्यस्थों पर,
- और स्वयंभू मुस्लिम प्रतिनिधियों पर।
इनमें से कई लोगों ने सरकारों के साथ बातचीत की और दावा किया कि वे मुसलमानों की ओर से बोल रहे हैं।
लेकिन सवाल है:
उन्होंने क्या बातचीत की?
क्या हासिल किया?
क्या छोड़ा?
उन्हें अधिकार किसने दिया था?
उनकी जवाबदेही किसके प्रति थी?
मुसलमान कांग्रेस से जवाबदेही मांगते हुए अपने प्रतिनिधियों को जवाबदेही से मुक्त नहीं रख सकते।
नया राजनीतिक नियम
इसलिए मुस्लिम राजनीतिक चार्टर में एक सार्वभौमिक सिद्धांत होना चाहिए:
कोई भी नेता केवल इसलिए भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधि नहीं बन सकता क्योंकि किसी राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन या टेलीविजन चैनल ने उसे मंच दे दिया है।
प्रतिनिधित्व प्रमाणित होना चाहिए।
समर्थन प्रमाणित होना चाहिए।
परिणाम प्रमाणित होने चाहिए।
2026 में कांग्रेस से मांग
कांग्रेस को अब एक औपचारिक “मुस्लिम प्रतिनिधित्व श्वेतपत्र” प्रकाशित करना चाहिए।
इसमें यह जानकारी होनी चाहिए:
A. उम्मीदवारों का आंकड़ा
हर लोकसभा चुनाव में कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया गया?
B. जीतने की संभावना
कितने उम्मीदवारों को ऐसी सीटों पर उतारा गया जहां वास्तव में जीत संभव थी?
C. संसद
कांग्रेस के टिकट पर कितने मुस्लिम सांसद चुने गए?
D. संगठन
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कितने मुसलमान निर्णयकारी पदों पर हैं?
E. सरकार
कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों में कितने मुसलमान मंत्री बने?
F. नीति
मुस्लिम सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए कौन-सी मापने योग्य नीतियां लागू की गईं?
G. जवाबदेही
कांग्रेस के वादों की समीक्षा करने के लिए मुस्लिम नागरिकों के पास कौन-सा संस्थागत तंत्र है?
अगर कांग्रेस यह आंकड़ा ईमानदारी से प्रकाशित करती है, तो राजनीतिक विश्वास दोबारा बनना शुरू हो सकता है।
अगर वह ऐसा करने से इनकार करती है, तो वह इनकार भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा।
मुस्लिम मतदाता का प्रतिप्रस्ताव
मुस्लिम समुदाय को भी अपना प्रस्ताव रखना चाहिए।
यह नहीं:
“हमें सुरक्षा दीजिए और हम आपको वोट देंगे।”
बल्कि:
“हमें प्रतिनिधित्व, संवैधानिक सुरक्षा और जवाबदेह सत्ता-साझेदारी दीजिए—हम आपके राजनीतिक प्रस्ताव पर अपने विवेक से विचार करेंगे।” mhm
यही एक परिपक्व लोकतांत्रिक संबंध है।
सबसे महत्वपूर्ण अंतर
उद्देश्य भारत के भीतर कोई अलग मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था बनाना नहीं है।
उद्देश्य इसके ठीक विपरीत है।
उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के पूर्ण और प्रभावी सहभागी बनाना है।
इसका अर्थ है:
समान नागरिकता।
समान सुरक्षा।
समान अवसर।
सार्थक प्रतिनिधित्व।
राजनीतिक गरिमा।
मांग यह नहीं है:
“मुसलमानों को विशेष सुविधा दो क्योंकि वे मुसलमान हैं।”
मांग यह है:
“जब वोट चाहिए तो मुसलमानों को नागरिक मत समझिए और जब सत्ता बांटने की बात हो तो उन्हें केवल अल्पसंख्यक कहकर किनारे मत कीजिए।”
अंतिम राजनीतिक ऑडिट
लगभग आठ दशकों की भारतीय लोकतांत्रिक यात्रा के बाद मुस्लिम सवाल अब यह नहीं होना चाहिए:
“क्या कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष है?”
यह सवाल बहुत आसान है।
मुश्किल सवाल हैं:
कांग्रेस वास्तव में कितने मुसलमानों को सशक्त बनाती है?
कितने मुस्लिम उम्मीदवारों को जीतने योग्य सीटें मिलती हैं?
कितने मुसलमान निर्णय लेने वाली संस्थाओं में हैं?
कांग्रेस के माध्यम से कितने मुसलमान सरकार में पहुंचते हैं?
कांग्रेस वास्तव में कितनी राजनीतिक शक्ति साझा करने को तैयार है?
और आखिर में:
चुनाव खत्म होने के बाद मुस्लिम मतदाता के साथ क्या होता है?
इन सवालों का उत्तर केवल राहुल गांधी के भाषणों से नहीं दिया जा सकता।
नरेंद्र मोदी के भाषणों से भी नहीं।
किसी इरफान से नहीं।
किसी मौलाना से नहीं।
किसी टेलीविजन प्रवक्ता से नहीं।
किसी राजनीतिक बिचौलिए से नहीं।
उत्तर केवल आंकड़ों, दस्तावेजों, संस्थाओं और परिणामों से दिया जा सकता है।
इस हिसाब-किताब का फैसला
उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड यह साबित नहीं करता कि कांग्रेस हमेशा मुसलमानों की विरोधी रही है।
लेकिन यह भी साबित नहीं करता कि कांग्रेस ने लगातार मुसलमानों को वास्तविक राजनीतिक शक्ति प्रदान की है।
इतिहास कहीं अधिक जटिल है।
कांग्रेस ने महत्वपूर्ण अवसरों पर धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था का बचाव किया है।
उसने ऐसे फैसले भी लिए हैं जिनसे मुसलमानों में गहरा अविश्वास पैदा हुआ।
उसने मुस्लिम पिछड़ेपन को पहचानने के लिए कार्यक्रम बनाए।
फिर भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व अपर्याप्त बना रहा।
उसने भाजपा का विरोध किया।
लेकिन भाजपा-विरोध को अपने आप में मुस्लिम सशक्तीकरण का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
यही इस राजनीतिक ऑडिट का केंद्रीय निष्कर्ष है।
कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस एक आवश्यक राजनीतिक माध्यम हो सकती है।
लेकिन इससे कांग्रेस को मुस्लिम वोट का स्थायी मालिकाना हक नहीं मिल जाता।
मुस्लिम मतदाता को अब परिवर्तन करना होगा:
वफादारी से जवाबदेही की ओर।
डर से बातचीत की ओर।
टोकनवाद से प्रतिनिधित्व की ओर।
वोट बैंक से सत्ता के साझेदार की ओर।
और हर राजनीतिक दल के लिए संदेश एक होना चाहिए:
मुस्लिम मतदाता से केवल यह मत पूछिए कि वह किससे डरता है।
उससे पूछिए कि वह क्या मांगता है।
और यदि उसका वोट चाहिए, तो सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी के लिए तैयार रहिए।
मुस्लिम वोट कोई ब्लैंक चेक नहीं है।
यह एक राजनीतिक अनुबंध है।
और 2026 में मतदाता उस अनुबंध की हर शर्त पढ़ रहा है।
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ہندوستانی مسلمان اب کسی کی سیاسی مہرہ نہیں بنے گا
راہل گاندھی، کانگریس اور مسلم سیاسی اعتماد کا بحران
سلسلہ — حصہ اول
تحریر: احمد سہیل صدیقی
ہندوستان کا مسلمان دیکھ رہا ہے۔
اور اس مرتبہ وہ صرف نریندر مودی، بی جے پی یا آر ایس ایس کو نہیں دیکھ رہا۔ وہ راہل گاندھی، کانگریس پارٹی اور پوری اپوزیشن کی سیاسی حکمتِ عملی کو بھی انتہائی محتاط اور تنقیدی نگاہ سے دیکھ رہا ہے۔
دہائیوں سے انتخاب کے وقت مسلمان ووٹر سے کہا جاتا رہا ہے کہ اس کی سیاسی ذمہ داری بہت سادہ ہے:
بی جے پی کو روکیے، ہندوتوا کو شکست دیجیے اور کانگریس یا اس جماعت کو ووٹ دیجیے جو بی جے پی کو شکست دینے کی پوزیشن میں ہو۔
لیکن اب ایک سوال سے بچنا مشکل ہوتا جا رہا ہے:
آخر ہندوستانی مسلمانوں کو کب تک اقتدار تک پہنچنے کی سیڑھی کے طور پر استعمال کیا جاتا رہے گا، اور اقتدار حاصل ہونے کے بعد انہیں کنارے کیا جاتا رہے گا؟
مسلم ووٹر اب صرف اس لیے اپنی سیاسی بصیرت ترک کرنے پر تیار نہیں کہ کانگریس سیکولرازم کی بات کرتی ہے یا راہل گاندھی سیاسی پلیٹ فارم سے آر ایس ایس اور ہندوتوا پر حملہ کرتے ہیں۔
صرف الفاظ کافی نہیں ہیں۔
مسلمان اقتدار میں حصہ داری، نمائندگی اور ادارہ جاتی ضمانت چاہتا ہے—محض تقریریں نہیں۔
راہل گاندھی کا سوال
راہل گاندھی نریندر مودی اور بی جے پی کے ایک اہم قومی سیاسی حریف کے طور پر ابھرے ہیں۔ آر ایس ایس، بی جے پی کی اکثریتی سیاست، ہندوتوا اور مبینہ ادارہ جاتی قبضے کے خلاف ان کی علانیہ جدوجہد نے اپوزیشن کو ایک نسبتاً واضح سیاسی زبان فراہم کی ہے۔
لیکن مسلم ووٹر کو یہ سوال پوچھنے کا پورا حق ہے:
اگر اقتدار کی جنگ جیت لی گئی تو مسلمانوں کا کیا ہوگا؟
کیا وہ سیاسی شراکت دار بنے رہیں گے؟
یا ایک بار پھر صرف انتخابی اعداد و شمار بن کر رہ جائیں گے؟
انتخابات کے دوران مسلم ووٹ اہم ہو جاتا ہے۔ سیکولرازم ایک مرکزی مسئلہ بن جاتا ہے۔ سیاسی رہنما مساجد، مدارس اور مسلم علاقوں کا رخ کرتے ہیں۔ مسلم دانشوروں اور سیاسی واسطہ کاروں کو گفتگو میں شامل کیا جاتا ہے۔
لیکن انتخابات کے بعد نمائندگی کا سوال اکثر بالکل مختلف شکل اختیار کر لیتا ہے۔
اور یہی اعتماد کے گہرے بحران کی بنیادی وجہ ہے۔
صرف آر ایس ایس مخالف بیانات کافی نہیں
عوامی جلسوں میں آر ایس ایس پر تنقید کرنا سیاسی طور پر آسان ہے۔
مشکل سوال یہ ہے کہ کیا سیاسی جماعتیں فرقہ واریت کے خلاف اپنی مخالفت کو ادارہ جاتی شکل دینے کے لیے تیار ہیں؟
اگر کانگریس واقعی سمجھتی ہے کہ آر ایس ایس۔بی جے پی کا ماڈل ہندوستان کے آئینی جمہوری نظام کے لیے خطرہ ہے، تو اس کی مخالفت صرف انتخابی تقریروں تک محدود نہیں رہ سکتی۔
اسے ایک واضح سیاسی پروگرام بننا ہوگا۔
نمائندگی کہاں ہے؟
اندرونی جمہوریت کہاں ہے؟
مسلم قیادت کہاں ہے؟
فیصلہ سازی کے اداروں میں مسلمانوں کی حصہ داری کہاں ہے؟
اور سب سے اہم:
کیا یہ ضمانت موجود ہے کہ مسلمانوں کو ایک مرتبہ پھر دفاعی انداز میں ووٹ دینے کے لیے کہا جائے گا اور اقتدار ملنے کے بعد دوسرے لوگ اس اقتدار کے ثمرات سے لطف اندوز ہوں گے؟
’عرفان‘ ماڈل مسلمانوں کی سیاسی خودمختاری نہیں
کسی ایک مسلم ترجمان، دانشور، مشیر یا واسطہ کار کی تقرری بذاتِ خود کانگریس کی مسلم وابستگی کا ثبوت نہیں بن سکتی۔
سوال یہ نہیں ہے کہ کانگریس اپنا موقف پیش کرنے کے لیے کسی عرفان کو تلاش کر سکتی ہے یا نہیں۔
سوال یہ ہے کہ کروڑوں ہندوستانی مسلمانوں کے پاس کانگریس کے اندر حقیقی فیصلہ کن طاقت کتنی ہے؟
علامتی نمائندگی، حقیقی نمائندگی نہیں ہے۔
ٹیلی ویژن پر کسی مسلم چہرے کی موجودگی مسلم بااختیاری نہیں ہے۔
کسی مسلم تقریر نویس کی موجودگی مسلم سیاسی طاقت نہیں ہے۔
چند جگہوں پر مسلم امیدوار کھڑا کر دینا ادارہ جاتی شراکت داری نہیں ہے۔
نمائندگی کا مطلب ہے—فیصلہ سازی میں حصہ، اقتدار کی تقسیم میں شراکت اور جواب دہی۔
’فکسڈ فائٹ‘ کا سوال
ایک اور بے آرام کرنے والا سیاسی سوال ہے جسے اپوزیشن محض مسترد نہیں کر سکتی۔
اگر کانگریس علانیہ طور پر آر ایس ایس اور بی جے پی کو اپنا نظریاتی حریف قرار دیتی ہے، لیکن ساتھ ہی مستقبل میں سیاسی مفاہمت، مذاکرات یا کسی قسم کی مفاہمت کے امکانات کے لیے دروازے کھلے رکھتی ہے، تو مسلمانوں کو یہ سوال پوچھنے کا حق ہے:
کیا کسی ممکنہ سیاسی سمجھوتے کی قیمت ایک بار پھر مسلمانوں کو ادا کرنا پڑے گی؟
یہ دعویٰ کہ راہل گاندھی یا کانگریس خفیہ طور پر آر ایس ایس کے ساتھ کوئی سمجھوتہ کر رہے ہیں، بغیر ثبوت کے ایک ثابت شدہ حقیقت کے طور پر پیش نہیں کیا جانا چاہیے۔
لیکن یہ سوال بذاتِ خود جمہوری اعتبار سے جائز ہے۔
ہندوستانی سیاست میں اختلاف رکھنے والی جماعتیں بھی حالات کے مطابق مذاکرات اور سمجھوتے کرتی رہی ہیں۔
آج کے سیاسی حریف کل کے سیاسی ساتھی بن سکتے ہیں۔
اور جب ایسا ہوتا ہے تو سوال پیدا ہوتا ہے:
قیمت کون ادا کرتا ہے؟
اقلیتوں کو اکثر یہ خدشہ رہا ہے کہ قیمت انہیں ادا کرنا پڑ سکتی ہے۔
کانگریس ہمیشہ مسلم حمایت کا مطالبہ نہیں کر سکتی
کانگریس بیک وقت یہ نہیں کہہ سکتی:
“ہمیں ووٹ دیجیے کیونکہ بی جے پی خطرناک ہے۔”
اور پھر یہ توقع کرے کہ مسلمان ہمیشہ بغیر کسی شرط کے اس کی حمایت کرتے رہیں۔
یہ دور اب ختم ہونا چاہیے۔
مسلم ووٹر کو اب دفاعی ووٹر کے طور پر نہیں دیکھا جانا چاہیے، جس کا واحد مقصد کسی دوسری جماعت کو شکست دینا ہو۔
مسلم ووٹر کو اقتدار میں حصہ داری کا مطالبہ کرنے والا ووٹر بننا ہوگا۔
یہ مطالبہ جمہوریت مخالف نہیں ہے۔
اس کے برعکس، یہی جمہوریت کی روح ہے۔
ایک جرات مندانہ تجویز: 50 فیصد نمائندگی
اگر کانگریس واقعی ہندوستانی مسلمانوں کو یہ یقین دلانا چاہتی ہے کہ اس میں تبدیلی آئی ہے، تو اسے تاریخی نوعیت کی اندرونی اصلاحات پر غور کرنا چاہیے۔
ایک تجویز یہ ہو سکتی ہے:
پارٹی کے تنظیمی اور امیدواروں کے انتخاب کے نظام میں مسلمانوں کو وسیع اور یقینی نمائندگی دی جائے، خصوصاً ان علاقوں میں جہاں مسلم ووٹر ایک اہم سیاسی قوت رکھتے ہیں۔
اس کے ساتھ:
- لوک سبھا امیدواروں کے انتخاب میں مناسب مسلم نمائندگی؛
- راجیہ سبھا میں مسلم نمائندگی؛
- اسمبلی انتخابات میں زیادہ مسلم امیدوار؛
- پارٹی تنظیموں میں مسلم شرکت؛
- پالیسی سازی کی کمیٹیوں میں مسلم اراکین؛
- پارلیمانی قیادت میں مسلم شرکت؛
- اور فرقہ واریت مخالف تحریری سیاسی منشور۔
البتہ ہر ادارے میں مذہبی بنیاد پر 50 فیصد ریزرویشن کا مطالبہ سنگین آئینی اور قانونی سوالات پیدا کرے گا اور اسے صرف پارٹی کے فیصلے سے نافذ نہیں کیا جا سکتا۔
لیکن بنیادی اصول—بامعنی اور یقینی اقتدار میں شراکت—پر سنجیدہ بحث ہونی چاہیے۔
وزارتِ عظمیٰ کو مشترکہ کرنے کا سوال
یہ تجویز کہ وزیر اعظم کی مدتِ کار مختلف برادریوں کے درمیان برابر تقسیم کی جائے، انتہائی متنازع ہے۔
ہندوستان کا آئین وزیر اعظم کے عہدے کو مذہبی بنیاد پر تقسیم کرنے کا کوئی طریقہ فراہم نہیں کرتا۔
وزیر اعظم پارلیمانی نظام کے تحت لوک سبھا میں اکثریت کی حمایت سے بنتا ہے۔
اس لیے مذہبی بنیاد پر وزارتِ عظمیٰ کی تقسیم آئینی طور پر نافذ نہیں کی جا سکتی۔
لیکن اس تجویز کے پیچھے چھپے سیاسی سوال کو بھی نظرانداز نہیں کیا جا سکتا:
کیا کوئی جمہوریت حقیقی شمولیت کا دعویٰ کر سکتی ہے اگر ایک بڑی اقلیتی برادری مسلسل انتظامیہ کے فیصلہ کن مراکز میں کم نمائندگی رکھتی ہو؟
اس کا آئینی حل مذہبی تقسیم نہیں بلکہ وسیع تر سیاسی نمائندگی ہونا چاہیے۔
مقصد مذہبی تقسیم نہیں، بلکہ مساوی شہریت ہونا چاہیے۔
مسلمانوں کو خوف کی بنیاد پر ووٹ دینا بند کرنا ہوگا
شاید یہی سب سے اہم تبدیلی ہے۔
مسلم ووٹر کو یہ سوال پوچھنا چھوڑنا ہوگا:
“بی جے پی کو کون شکست دے سکتا ہے؟”
اور یہ پوچھنا ہوگا:
“ہمیں اقتدار میں حقیقی حصہ داری کون دے گا؟”
یہ بالکل مختلف سیاسی سوال ہے۔
اگر کانگریس مسلم ووٹ چاہتی ہے تو اسے یہ ووٹ حاصل کرنا ہوگا۔
اگر کوئی دوسری اپوزیشن جماعت مسلم ووٹ چاہتی ہے تو اسے بھی یہ ووٹ حاصل کرنا ہوگا۔
اگر بی جے پی مسلم ووٹ چاہتی ہے تو اسے بھی اسے حاصل کرنا ہوگا۔
کسی بھی جماعت کو صرف اس لیے مسلم حمایت کا فطری حق نہیں ملنا چاہیے کہ دوسری جماعت اس سے زیادہ خراب سمجھی جاتی ہے۔
مسلم ووٹ کانگریس کی جاگیر نہیں ہے۔
نہ کسی علاقائی جماعت کی۔
نہ بی جے پی کی۔
یہ ہندوستانی شہری کا ووٹ ہے—اور اس کا مالک وہی شہری ہے۔
نیا مسلم سیاسی معاہدہ
مستقبل میں مسلمانوں اور سیاسی جماعتوں کے درمیان تعلقات ایک واضح سیاسی معاہدے پر مبنی ہونے چاہئیں:
اندھی وفاداری نہیں۔
مستقل سیاسی وفاداری نہیں۔
علامتی نمائندگی نہیں۔
خوف کی بنیاد پر ووٹنگ نہیں۔
انتخابی بلیک میل نہیں۔
انتخابات کے بعد نظرانداز کرنا نہیں۔
اس کے بدلے:
نمائندگی۔
جوابدہی۔
اقتدار میں شراکت۔
آئینی ضمانت۔
سیاسی شرکت۔
اور ٹھوس نتائج۔
راہل گاندھی نریندر مودی کو چیلنج کرنے میں کامیاب ہوں یا نہ ہوں۔
کانگریس اقتدار میں واپس آئے یا نہ آئے۔
بی جے پی اقتدار میں رہے یا نہ رہے۔
یا ہندوستانی سیاست کوئی بالکل نیا سیاسی منظرنامہ پیدا کرے۔
ایک بات ضرور بدلنی چاہیے:
ہندوستانی مسلمان کسی اور کی اقتدار کی جنگ میں مہرہ بن کر نہیں رہ سکتا۔
اسے کھلاڑی بننا ہوگا۔
کیونکہ اگر مسلمان بار بار سیڑھی فراہم کرتا رہے گا اور دوسرے لوگ اسی سیڑھی سے اقتدار تک پہنچتے رہیں گے، تو اصل سوال یہ نہیں ہوگا کہ انتخاب کون جیتا۔
اصل سوال ہوگا:
اقتدار حقیقت میں کس نے حاصل کیا—اور کس نے صرف ووٹ دیے؟
یہی وہ سوال ہے جو ہندوستانی مسلمانوں کو کانگریس سمیت ہر سیاسی جماعت سے پوچھنا چاہیے۔
مسلم ووٹ اب کسی کا بلینک چیک نہیں ہے۔
اقتدار میں حصہ داری چاہیے—صرف اقتدار بدلنے کا وعدہ نہیں۔
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مسلم ووٹ اب کسی کا بلینک چیک نہیں
راہل گاندھی، کانگریس اور مسلم سیاسی اعتماد کا تضاد
سلسلہ — حصہ دوم
تحریر: احمد سہیل صدیقی
وہ سوال جس سے اب فرار ممکن نہیں
ہندوستانی مسلمان ایک ایسے سیاسی موڑ پر پہنچ چکا ہے جہاں اسے اپنے سیاسی مستقبل کے بارے میں ازسرِنو غور کرنا ہوگا۔
دہائیوں سے انتخابات کے وقت اس کے سامنے ایک ہی سوال رکھا جاتا رہا ہے:
“بی جے پی کو کون شکست دے سکتا ہے؟”
لیکن اب سوال بدلنا چاہیے:
“ہمارے سیاسی حقوق اور اقتدار میں حصہ داری کی ضمانت کون دے گا؟”
یہ معمولی فرق نہیں ہے۔
ایک برادری کے پاس کروڑوں ووٹ ہو سکتے ہیں، لیکن اگر فیصلہ سازی کے اداروں میں اس کی مناسب نمائندگی نہ ہو تو ضروری نہیں کہ وہ سیاسی طور پر طاقتور بھی ہو۔
وہ محض انتخابی طور پر مفید بھی ہو سکتی ہے۔
اور یہی ہندوستانی مسلم سیاست کا سب سے بڑا مسئلہ ہے۔
راہل گاندھی کا دور
حالیہ برسوں میں راہل گاندھی نے کانگریس کی سیاسی زبان کو بڑی حد تک تبدیل کیا ہے۔
آر ایس ایس، بی جے پی کی اکثریتی سیاست اور ہندوتوا نظریے کے خلاف ان کی علانیہ جدوجہد نے اپوزیشن کو ایک نسبتاً واضح متبادل سیاسی بیانیہ دیا ہے۔
لیکن مسلمانوں کے لیے یہ صرف آغاز ہے۔
اصل امتحان ادارہ جاتی سطح پر ہوگا۔
فرض کیجیے کانگریس دوبارہ اقتدار میں آ جاتی ہے۔
تب کیا ہوگا؟
کیا مسلمانوں کو کابینہ میں حقیقی نمائندگی ملے گی؟
کیا مسلم امیدواروں کو زیادہ تعداد میں جیتنے کے قابل لوک سبھا نشستیں دی جائیں گی؟
کیا پارٹی کے اعلیٰ فیصلہ ساز اداروں میں مسلم نمائندگی بڑھے گی؟
کیا کانگریس آئینی سیکولرازم کے تحفظ کے لیے انتخابی حالات سے بالاتر مستقل عہد کرے گی؟
یا پرانا فارمولہ دوبارہ لوٹ آئے گا؟
مسلم ووٹ کو بی جے پی کو شکست دینے کے لیے استعمال کرو اور اس کے بعد مسلم سیاسی شراکت کے بغیر حکومت چلاؤ۔
یہی وہ سوال ہے جس کا جواب راہل گاندھی اور کانگریس کو دینا ہوگا۔
تاریخ کو مٹایا نہیں جا سکتا
ہندوستانی مسلمانوں کے ساتھ کانگریس کا تعلق طویل اور پیچیدہ رہا ہے۔
اسے یہ کہہ کر ختم نہیں کیا جا سکتا کہ کانگریس ہمیشہ مسلمانوں کی دوست رہی ہے۔
اور اسے یہ کہہ کر بھی ختم نہیں کیا جا سکتا کہ کانگریس ہمیشہ مسلمانوں کے خلاف رہی ہے۔
ہندوستانی سیاسی تاریخ اس سے کہیں زیادہ پیچیدہ ہے۔
کانگریس حکومتوں نے ایسے فیصلے بھی کیے جن سے اقلیتوں کو فائدہ پہنچا اور آئینی سیکولرازم کا تحفظ ہوا۔
لیکن کانگریس حکومتوں نے ایسے فیصلے بھی کیے جنہوں نے مسلمانوں میں گہرا عدم اعتماد پیدا کیا۔
شاہ بانو معاملہ، بابری مسجد تنازع کا سیاسی انتظام، 1986 میں متنازع مقام کے تالے کھلنا اور رام جنم بھومی تحریک کے گرد ہونے والے سیاسی واقعات آج بھی مسلم سیاسی حافظے کا حصہ ہیں۔
ان واقعات کی مختلف تشریحات ممکن ہیں۔
لیکن ایک بات واضح ہے:
کانگریس کے اپنے فیصلوں نے کئی مواقع پر مسلم سیاسی اعتماد کو شدید نقصان پہنچایا۔
اس لیے آج صرف سیکولرازم کا نام لینا کافی نہیں ہوگا۔
تاریخ کا جواب جواب دہی کے ذریعے دینا ہوگا۔
بابری مسجد کا سوال
ہندوستانی مسلمانوں کے لیے بابری مسجد محض ایک پرانا سیاسی تنازع نہیں ہے۔
یہ سیاسی عدم تحفظ کی ایک علامت بن چکی ہے۔
متنازع عمارت صدیوں تک موجود رہی۔
رام جنم بھومی تحریک نے اس مسئلے کو آزاد ہندوستان کی سب سے طاقتور سیاسی تحریکوں میں تبدیل کر دیا۔
6 دسمبر 1992 کی مسماری نے ہندوستانی سیاست کو مستقل طور پر بدل دیا۔
کانگریس اس پورے دور کے اپنے تاریخی کردار کو محض بی جے پی پر تنقید کرکے ختم نہیں کر سکتی۔
مسلمانوں کا سوال آج بھی یہی ہے:
جب کانگریس کے پاس اقتدار اور آئینی اختیارات تھے تو اس نے کیا کیا؟
یہ سوال جائز ہے۔
اس کا جواب صرف آر ایس ایس کے خلاف ایک اور تقریر سے نہیں دیا جا سکتا۔
اس کا جواب دستاویزات، فیصلوں اور جواب دہی کے ذریعے دینا ہوگا۔
شاہ بانو کا سبق
شاہ بانو معاملہ ایک اور اہم سیاسی سبق دیتا ہے۔
1985 میں سپریم کورٹ نے شاہ بانو کیس میں فیصلہ دیا۔
اس کے بعد راجیو گاندھی حکومت نے 1986 میں ایسا قانون منظور کیا جس نے اس فیصلے کے اثر کو محدود کر دیا۔
اس واقعے نے ایک بنیادی بات واضح کر دی:
سیاسی طور پر کسی برادری کو خوش کرنا اور اسے سیاسی طور پر بااختیار بنانا ایک ہی چیز نہیں ہے۔
کسی برادری کو انتخابی سیاست میں خوش کیا جا سکتا ہے، جبکہ اس کے پاس آزاد سیاسی نمائندگی اور فیصلہ سازی کی طاقت بہت کم ہو۔
آج اس فرق کو سمجھنا ضروری ہے۔
مسلمانوں کو ایسی سیاسی جماعت کی ضرورت نہیں جو صرف یہ کہے:
“ہم آپ کی حفاظت کریں گے۔”
انہیں ایسی سیاسی نظام کی ضرورت ہے جس میں مسلمانوں کے پاس اپنے مفادات کے جمہوری تحفظ کے لیے مناسب نمائندگی اور ادارہ جاتی طاقت موجود ہو۔
آر ایس ایس مخالف بیانات کافی نہیں
یہ سیاسی طور پر آسان ہے کہ کوئی رہنما عوامی جلسے میں آر ایس ایس پر تنقید کرے۔
مشکل کام یہ ہے کہ اس بات کو یقینی بنایا جائے کہ فرقہ واریت مخالف عہد حکومتی پالیسی اور ادارہ جاتی ڈھانچے میں بھی نظر آئے۔
اگر کانگریس واقعی سمجھتی ہے کہ آر ایس ایس۔بی جے پی کا ماڈل ہندوستانی جمہوریت کے لیے خطرہ ہے تو اسے اپنی مخالفت کو مستقل سیاسی پروگرام میں تبدیل کرنا ہوگا۔
سوال صرف یہ نہیں ہونا چاہیے:
“بی جے پی کے خلاف کون بولتا ہے؟”
سوال ہونا چاہیے:
“اقتدار میں آنے کے بعد کون کیا کرے گا؟”
’فکسڈ فائٹ‘ کا مفروضہ
سیاسی حلقوں میں کبھی کبھی یہ سوال اٹھایا جاتا ہے:
کیا کانگریس اور بی جے پی کے درمیان لڑائی انتخابی سطح پر حقیقی ہے، لیکن اقتدار کی سیاست میں مستقبل کے سمجھوتے کی گنجائش رکھی جاتی ہے؟
اسے ثابت شدہ حقیقت قرار نہیں دیا جا سکتا۔
بغیر دستاویزی ثبوت کے خفیہ مذاکرات، سیاسی سفیروں یا کسی پوشیدہ سمجھوتے کو حقیقت کے طور پر پیش کرنا مناسب نہیں ہوگا۔
لیکن سوال بذاتِ خود جائز ہے۔
ہندوستانی سیاست میں مخالف جماعتیں بھی حالات کے مطابق مذاکرات کرتی رہی ہیں۔
اس لیے مسلمانوں کو ایک اصول واضح کرنا چاہیے:
ایسا کوئی سیاسی سمجھوتہ جو آئینی حقوق یا اقلیتی تحفظ کو متاثر کرے، مسلمانوں کی قیمت پر نہیں ہونا چاہیے۔
کوئی خفیہ سمجھوتہ نہیں۔
کوئی غیر رسمی سودا نہیں۔
آئینی حقوق پر کوئی سیاسی سمجھوتہ نہیں۔
کانگریس کا اصل امتحان
اگر کانگریس واقعی ہندوستانی مسلمانوں کے ساتھ اپنے تعلقات کو نئی شکل دینا چاہتی ہے تو اسے اپنے وعدوں کو قابلِ پیمائش بنانا ہوگا۔
جذباتی نہیں۔
محض تقریری نہیں۔
قابلِ پیمائش۔
کانگریس کو یہ اعداد و شمار عوام کے سامنے رکھنے چاہئیں:
1۔ تنظیم میں مسلم نمائندگی
کتنے مسلمان حقیقی فیصلہ ساز عہدوں پر ہیں؟
2۔ مسلم امیدوار
کتنے مسلم امیدواروں کو ٹکٹ ملتا ہے؟
اور اس سے بھی اہم:
کتنوں کو جیتنے کے قابل نشستیں دی جاتی ہیں؟
3۔ پارلیمانی نمائندگی
کانگریس کی پارلیمانی قیادت میں کتنے مسلمان ہیں؟
4۔ کابینہ میں نمائندگی
اگر کانگریس کی حکومت بنتی ہے تو اقلیتی نمائندگی کے لیے کیا اصول ہوں گے؟
5۔ ریاستی سطح پر نمائندگی
اسمبلیوں اور ریاستی حکومتوں میں مسلم شرکت بڑھانے کے لیے کیا پالیسی ہوگی؟
6۔ پالیسی سازی
اقلیتوں سے متعلق کانگریس کی پالیسیاں بنانے میں کتنے مسلمان شریک ہوتے ہیں؟
7۔ فرقہ واریت مخالف نظام
کیا کانگریس فرقہ وارانہ تشدد اور امتیاز کی نگرانی کے لیے کوئی آزاد نظام قائم کرے گی؟
8۔ جواب دہی
کیا کانگریس ہر سال اقلیتوں کے لیے کیے گئے اپنے وعدوں کی عوامی رپورٹ جاری کرے گی؟
یہی ٹھوس سوالات ہیں۔
50 فیصد نمائندگی کا مطالبہ
کانگریس کے اندر 50 فیصد مسلم نمائندگی کا مطالبہ دانستہ طور پر ایک جرات مندانہ اور بحث پیدا کرنے والا تصور ہے۔
اس پر سنجیدگی سے غور کیا جانا چاہیے۔
ہر منتخب ادارے میں مذہب کی بنیاد پر 50 فیصد ریزرویشن کا مطالبہ آئینی اور قانونی سوالات پیدا کرے گا۔
لیکن کانگریس اپنے اندرونی سیاسی ڈھانچے میں بڑی تبدیلیاں ضرور کر سکتی ہے۔
وہ شفاف نمائندگی کے اہداف مقرر کر سکتی ہے۔
وہ امیدواروں کے انتخاب میں مسلم شرکت بڑھا سکتی ہے۔
وہ یہ عوامی طور پر بتا سکتی ہے کہ مسلم امیدواروں کو کتنی حقیقی اور جیتنے کے قابل نشستیں دی گئیں۔
اس سے بحث کا رخ بدل جائے گا۔
آج سوال ہوتا ہے:
“کیا کانگریس مسلمانوں کی حمایت کرتی ہے؟”
کل سوال ہونا چاہیے:
“کانگریس نے مسلمانوں کو حقیقی سیاسی طاقت کتنی دی؟”
یہی تحفظ اور بااختیاری کے درمیان فرق ہے۔
وزارتِ عظمیٰ کا سوال
وزارتِ عظمیٰ کی مدت مختلف مذہبی برادریوں کے درمیان برابر تقسیم کرنے کی تجویز سیاسی طور پر انتہائی جرات مندانہ ہے، لیکن آئینی طور پر سنگین مشکلات پیدا کرتی ہے۔
ہندوستان کا آئین وزارتِ عظمیٰ کی مذہبی بنیاد پر گردش یا تقسیم کی کوئی گنجائش نہیں دیتا۔
وزیر اعظم پارلیمانی اکثریت اور لوک سبھا کی حمایت سے بنتا ہے۔
لہٰذا وزارتِ عظمیٰ کا مذہبی کوٹا موجودہ آئینی نظام کے تحت براہِ راست نافذ نہیں کیا جا سکتا۔
لیکن اس کے پیچھے موجود سوال اہم ہے:
کیا کوئی جمہوریت حقیقی شمولیت کا دعویٰ کر سکتی ہے جب ایک بڑی اقلیتی برادری بار بار انتظامیہ کے فیصلہ ساز مراکز میں کم نمائندگی پاتی ہو؟
اس کا حل مذہبی تقسیم نہیں ہونا چاہیے۔
حل ہونا چاہیے:
وسیع تر نمائندگی۔
مساوی شہریت۔
مساوی سیاسی شرکت۔
مسلمانوں کو خوف کی بنیاد پر ووٹ دینا بند کرنا ہوگا
یہ سب سے بڑی سیاسی تبدیلی ہو سکتی ہے۔
مسلم ووٹر کو یہ سوال پوچھنے سے آگے بڑھنا ہوگا:
“بی جے پی کو کون شکست دے سکتا ہے؟”
اور پوچھنا ہوگا:
“ہمیں اقتدار میں حقیقی حصہ داری کون دے گا؟”
اگر کانگریس مسلم ووٹ چاہتی ہے تو اسے یہ ووٹ حاصل کرنا ہوگا۔
اگر کوئی علاقائی جماعت چاہتی ہے تو اسے بھی اسے حاصل کرنا ہوگا۔
اگر بی جے پی مسلم ووٹ چاہتی ہے تو اسے بھی اسے حاصل کرنا ہوگا۔
کسی بھی جماعت کو صرف اس لیے مسلم ووٹ کا فطری حق حاصل نہیں ہو سکتا کہ دوسری جماعت اس سے زیادہ خراب سمجھی جاتی ہے۔
مسلم ووٹ کانگریس کی جاگیر نہیں ہے۔
وہ کسی علاقائی جماعت کی جاگیر نہیں ہے۔
وہ کسی مذہبی رہنما کی جاگیر نہیں ہے۔
وہ ہندوستانی مسلمان شہری کا جمہوری حق ہے۔
ووٹ بینک سے اقتدار کے شراکت دار تک
مقصد کانگریس کے لیے ایک نیا مسلم ووٹ بینک بنانا نہیں ہونا چاہیے۔
مقصد ہونا چاہیے:
مسلمانوں کو ووٹ بینک سے ایک آزاد جمہوری سیاسی قوت میں تبدیل کرنا۔
ایسی قوت جو:
کانگریس سے بات کر سکے۔
علاقائی جماعتوں سے بات کر سکے۔
بی جے پی سے بھی سوال کر سکے۔
جس سے بھی حمایت مانگی جائے، اس سے اپنے حقوق کا مطالبہ کر سکے۔
لیکن ساتھ ہی:
آئینی اقدار کو ترک کیے بغیر۔
قومی یکجہتی کو ترک کیے بغیر۔
جمہوری اصولوں کو ترک کیے بغیر۔
اور سب سے اہم:
اپنی سیاسی خودمختاری ترک کیے بغیر۔
راہل گاندھی کے لیے پیغام
راہل گاندھی کو نریندر مودی اور آر ایس ایس کو چیلنج کرنے کا پورا جمہوری حق حاصل ہے۔
لیکن اگر وہ چاہتے ہیں کہ ہندوستانی مسلمان ان کے ساتھ کھڑا ہو تو انہیں ایک سادہ سوال کا جواب دینا ہوگا:
“بی جے پی سے تحفظ کے علاوہ مسلمانوں کو کیا ملے گا؟”
کیونکہ تحفظ اقتدار نہیں ہے۔
نمائندگی اقتدار ہے۔
شرکت اقتدار ہے۔
فیصلہ سازی کی صلاحیت اقتدار ہے۔
جوابدہی اقتدار ہے۔
آئینی شہریت اقتدار ہے۔
کانگریس کے لیے پیغام
کانگریس کو اس مطالبے سے خوف زدہ نہیں ہونا چاہیے۔
اسے اس کا خیر مقدم کرنا چاہیے۔
اگر کانگریس واقعی سمجھتی ہے کہ ہندوستان کا مستقبل اکثریتی سیاست کو روکنے میں ہے، تو اسے دکھانا ہوگا کہ وہ ایسا سیاسی متبادل تشکیل دے سکتی ہے جس میں اقلیتیں صرف محفوظ ہی نہ ہوں بلکہ فیصلہ سازی میں شریک بھی ہوں۔
ورنہ علامتی نمائندگی کا الزام برقرار رہے گا۔
مسلمانوں کے لیے پیغام
ہندوستانی مسلمانوں کو کسی سیاسی نجات دہندہ کی تلاش بند کرنی ہوگی۔
انہیں کسی جماعت کا مستقل سیاسی پیروکار بننے سے بھی انکار کرنا ہوگا۔
انہیں اپنے سیاسی حقوق کا ایجنڈا خود طے کرنا ہوگا۔
نمائندگی مانگیے۔
جوابدہی مانگیے۔
اقتدار میں حصہ داری مانگیے۔
آئینی تحفظ مانگیے۔
اور ووٹ دینے سے پہلے نتائج مانگیے۔
آخری سوال
دہائیوں سے ہندوستانی مسلمانوں سے کہا گیا:
“اگر آپ نے ہمیں ووٹ نہیں دیا تو بی جے پی آ جائے گی۔”
یہ دلیل آج بھی انتخابات پر اثر انداز ہو سکتی ہے۔
لیکن نئی نسل پوچھ رہی ہے:
“اگر ہم آپ کو ووٹ دیں گے تو ہمیں کیا ملے گا؟”
یہ لازماً کانگریس مخالف سوال نہیں ہے۔
یہ بی جے پی کے حق میں سوال بھی نہیں ہے۔
یہ جمہوریت کا سوال ہے۔
اور کانگریس کو اس کا جواب دینا چاہیے۔
کیونکہ نریندر مودی کو شکست دینا کوئی سیاسی فلسفہ نہیں ہے۔
یہ صرف ایک انتخابی مقصد ہے۔
اصل سوال یہ ہے:
اس کے بعد ہندوستان کیسا ہوگا؟
اور اس ہندوستان میں ہندوستانی مسلمانوں کی حصہ داری کتنی ہوگی؟
مسلم ووٹ کسی کا بلینک چیک نہیں۔
خوف کی بنیاد پر کوئی مستقل مینڈیٹ نہیں۔
علامتی نمائندگی نہیں۔
اقتدار میں حقیقی حصہ داری—ورنہ ووٹ کیوں؟
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کانگریس–مسلم سیاسی حساب کتاب
1947–2026: وعدے، فیصلے، نمائندگی اور سیاسی وفاداری کی قیمت
سلسلہ — حصہ سوم
تحریر: احمد سہیل صدیقی
یہ فردِ جرم نہیں، سیاسی آڈٹ ہے
اگر ہندوستانی مسلمان کانگریس کے ساتھ اپنے سیاسی تعلقات پر ازسرِنو غور کرنا چاہتے ہیں تو یہ کام مفروضوں یا سیاسی افسانوں کی بنیاد پر نہیں بلکہ شواہد کی بنیاد پر ہونا چاہیے۔
کانگریس کا جائزہ صرف اس کے مخالفین کے بیانات کی بنیاد پر نہیں لیا جا سکتا۔
اور نہ ہی صرف اس کے حامیوں کی بنیاد پر۔
اس کا ریکارڈ دیکھنا ہوگا۔
اس کے وعدوں کا موازنہ اس کے فیصلوں سے کرنا ہوگا۔
اس کی سیاسی بیان بازی کا موازنہ اس کی نمائندگی سے کرنا ہوگا۔
اور مسلمانوں کے ساتھ اس کے رویے کو صرف اس سوال سے نہیں پرکھا جا سکتا:
“کیا کانگریس نے بی جے پی کی مخالفت کی؟”
بلکہ اصل سوال یہ ہونا چاہیے:
“جب کانگریس کے پاس سیاسی اقتدار تھا تو اس نے ہندوستانی مسلمانوں کے لیے حقیقتاً کیا کیا؟”
یہی اس سیاسی حساب کتاب کا مقصد ہے۔
1947–1984
کانگریس کے غلبے کا دور
آزادی کے بعد کئی دہائیوں تک کانگریس ہندوستان کی سب سے بڑی قومی سیاسی طاقت رہی۔
اس کے سیاسی اتحاد میں مسلمانوں سمیت بڑے پیمانے پر اقلیتی برادریاں شامل رہیں۔
کانگریس کا سیاسی ماڈل مذہبی اکثریت پسندی کے بجائے سیکولر قوم پرستی پر مبنی ہونے کا دعویٰ کرتا تھا۔
تقسیم کے بعد کے ہندوستان میں مسلمانوں کے لیے یہ نہایت اہم تھا۔
لیکن انتخابی انحصار اور سیاسی بااختیاری دو الگ چیزیں ہیں۔
لہٰذا اس دور کا پہلا سوال یہ ہونا چاہیے:
کیا کانگریس نے مسلمانوں کو اقتدار میں برابر کا شریک بنایا—یا بنیادی طور پر ایک قابلِ اعتماد انتخابی بنیاد کے طور پر دیکھا؟
اس کا جواب کسی ایک عدد یا اعداد و شمار میں نہیں دیا جا سکتا۔
کانگریس حکومتوں نے اقلیتوں کے لیے تعلیم، فلاح اور نمائندگی سے متعلق پالیسیاں بھی اختیار کیں۔
لیکن سرکاری ملازمتوں اور متعدد طاقتور اداروں میں مسلمانوں کی نمائندگی کم ہی رہی۔
بالآخر صورتِ حال اتنی تشویش ناک ہوئی کہ متحدہ ترقی پسند اتحاد کی حکومت نے سچر کمیٹی قائم کی، جس نے مسلمانوں کی سماجی، معاشی اور تعلیمی حالت کا جامع مطالعہ کیا۔
یہ حقیقت خود بہت اہم تھی۔
کیونکہ اس سے واضح ہوا کہ محض انتخابی اہمیت خود بخود سماجی اور معاشی بااختیاری میں تبدیل نہیں ہوتی۔
1984
وہ سال جس نے سیاسی تحفظ کے تصور کو ہلا کر رکھ دیا
وزیر اعظم اندرا گاندھی کے قتل کے بعد 1984 میں سکھ مخالف تشدد ہوا۔
مسلم سیاسی سوال کے تناظر میں یہ واقعہ اس لیے اہم ہے کہ:
جو سیاسی جماعت سیکولر ہندوستان کی نمائندگی کا دعویٰ کرتی ہے، اسے اس بات سے بھی پرکھا جانا چاہیے کہ جب کسی اقلیتی برادری پر حملہ ہو تو وہ کیا کرتی ہے۔
1984 کا تشدد آزاد ہندوستان کی تاریخ کے سیاہ ترین ابواب میں شامل ہے۔
اس سے ایک وسیع تر سبق بھی ملتا ہے۔
چاہے سکھ ہوں، مسلمان ہوں، عیسائی ہوں یا کوئی دوسری اقلیت—
محض سیاسی یقین دہانی پر انحصار کافی نہیں ہے۔
ادارہ جاتی جواب دہی ضروری ہے۔
آئینی حقوق کو سیاسی تحفظ کے بدلے کبھی ترک نہیں کیا جانا چاہیے۔
1985
شاہ بانو: جب ریاست سیاسی کشمکش کا میدان بن گئی
شاہ بانو مقدمے میں سپریم کورٹ کے فیصلے نے مسلم مطلقہ خواتین کے نان و نفقہ اور مسلم پرسنل لا کے حوالے سے ایک بڑا سیاسی تنازع پیدا کیا۔
اس کے بعد راجیو گاندھی حکومت نے مسلم خواتین (طلاق کے حقوق کا تحفظ) ایکٹ، 1986 منظور کیا۔
اس واقعے کی مختلف سیاسی تشریحات کی گئی ہیں۔
ایک موقف کے مطابق یہ قدامت پسند مسلم قیادت کے دباؤ میں کیا گیا سیاسی سمجھوتا تھا۔
دوسرا موقف اسے مسلم پرسنل لا کی خودمختاری کے تحفظ کی کوشش قرار دیتا ہے۔
لیکن اس سے ایک بڑا سیاسی سبق ضرور نکلتا ہے:
کسی برادری کو سیاسی طور پر خوش کرنا اور اسے سیاسی طور پر بااختیار بنانا ایک ہی چیز نہیں ہے۔
کسی برادری کو انتخابی سیاست میں خوش کیا جا سکتا ہے، جبکہ اس کے پاس آزاد سیاسی نمائندگی اور فیصلہ سازی کی طاقت بہت محدود ہو۔
آج کے لیے سبق واضح ہے:
ہندوستانی مسلمانوں کے سیاسی مستقبل کا فیصلہ سیاسی اشرافیہ اور واسطہ کاروں کے بند کمروں میں نہیں ہونا چاہیے۔
1986
بابری مسجد: تالے کھولے گئے
فروری 1986 میں متنازع بابری مسجد/رام جنم بھومی مقام کے تالے کھولنے کا واقعہ ہندوستانی سیاست کا ایک فیصلہ کن موڑ بن گیا۔
اس کے بعد ایک سیاسی بیانیہ تشکیل پایا کہ اس وقت کی کانگریس حکومت نے سیاسی توازن قائم رکھنے کے لیے تالے کھلوانے میں کردار ادا کیا۔
لیکن تاریخی جواب دہی کے لیے احتیاط ضروری ہے۔
بعد میں وزیر اعظم کے دفتر کے سابق سینئر افسر وجاہت حبیب اللہ نے اس مقبول تصور پر سوال اٹھایا کہ راجیو گاندھی کو تالے کھولنے کے بارے میں پہلے سے علم تھا۔
اس لیے ایک سنجیدہ تحقیق میں مختلف سوالات کو الگ الگ رکھنا چاہیے:
کیا ہوا؟
حکم کس نے دیا؟
کسے پہلے سے علم تھا؟
کسے سیاسی فائدہ حاصل ہوا؟
اور:
اس کے بعد کیا ہوا؟
ان تمام سوالات کے جوابات ایک جیسے ہونا ضروری نہیں۔
لیکن ایک بات واضح ہے:
اس واقعے نے ہندوستانی سیاست پر گہرا اثر ڈالا۔
1989
ایودھیا قومی انتخابی سیاست کے مرکز میں
1980 کی دہائی کے آخر تک ایودھیا قومی سیاسی مسئلہ بن چکا تھا۔
کانگریس کی پوزیشن شدید سیاسی دباؤ کے درمیان مسلسل تبدیل ہوتی رہی۔
وہ نہ تو بی جے پی کی ابھرتی ہوئی ہندوتوا تحریک کو مکمل طور پر قبول کر سکتی تھی اور نہ ہی ایودھیا کو قومی سیاست کے مرکز میں آنے سے روکنے میں کامیاب رہی۔
اس سے ایک نئی سیاسی صورتِ حال پیدا ہوئی:
کانگریس بی جے پی سے انتخابی مقابلہ کر رہی تھی، لیکن سیاسی ماحول تیزی سے بی جے پی کے نظریے سے متاثر ہو رہا تھا۔
مسلمانوں کے لیے سوال یہ تھا:
اگر کانگریس اپنے حریف کے بنائے ہوئے سیاسی ایجنڈے کے دباؤ میں آ رہی ہے تو مسلم سیاسی مفادات کا تحفظ کون کرے گا؟
1992
بابری مسجد کی شہادت
6 دسمبر 1992 جدید ہندوستانی سیاست کی سب سے فیصلہ کن تاریخوں میں سے ایک ہے۔
متنازع ڈھانچہ منہدم کر دیا گیا۔
ریاست کی موجودگی اور سپریم کورٹ کو دی گئی یقین دہانیوں کے باوجود یہ واقعہ پیش آیا۔
لبراہن کمیشن نے انہدام کے حالات کی تحقیقات کیں۔
اس کے سیاسی نتائج انتہائی وسیع تھے۔
لیکن مسلمانوں کے لیے اس کا سب سے بڑا سبق یہ تھا:
سیاسی یقین دہانیاں آئینی اور عملی تحفظ کی ضمانت نہیں بن سکتیں۔
اسی لیے آج کانگریس کے وعدوں کو تقریروں سے نہیں بلکہ ادارہ جاتی تحفظ کے اقدامات سے پرکھنا ہوگا۔
1992–2004
نئے سیاسی فارمولے کی تلاش
بابری مسجد کی شہادت نے ہندوستانی سیاست کو بدل دیا۔
بی جے پی قومی سیاست میں مسلسل مضبوط ہوتی گئی۔
کانگریس نے خود کو اہم سیکولر متبادل کے طور پر پیش کیا۔
نتیجتاً مسلم ووٹ تیزی سے دفاعی نوعیت اختیار کرتا گیا۔
سوال بدل گیا:
پہلے:
“مسلمانوں کی نمائندگی کون کرتا ہے؟”
بعد میں:
“بی جے پی کو کون شکست دے سکتا ہے؟”
یہیں سے جدید خوف پر مبنی انتخابی سمجھوتے کی بنیاد مضبوط ہوئی۔
اور جب یہ نظام مضبوط ہوتا گیا تو مسلم سیاسی سودے بازی کی طاقت paradoxically کم ہوتی گئی۔
کیوں؟
کیونکہ اگر کسی سیاسی جماعت کو یقین ہو کہ ایک برادری صرف دوسری جماعت کو روکنے کے لیے اسے ووٹ دے گی تو اسے حقیقی اقتدار میں شراکت دینے کا دباؤ کم ہو جاتا ہے۔
2004–2014
یو پی اے کا تجربہ
کانگریس کی قیادت والے متحدہ ترقی پسند اتحاد نے یہ پرکھنے کا اہم موقع فراہم کیا کہ کیا سیکولر سیاست کو حقیقی اقلیتی بااختیاری میں تبدیل کیا جا سکتا ہے۔
حکومت نے سچر کمیٹی قائم کی۔
اس کمیٹی نے مسلمانوں کی سماجی، معاشی اور تعلیمی صورتِ حال کا مطالعہ کیا۔
یہ ایک اہم قدم تھا۔
کیونکہ پہلی مرتبہ ریاست نے وسیع پیمانے پر یہ تسلیم کیا کہ مسلم مسئلہ صرف فرقہ وارانہ یا انتخابی مسئلہ نہیں ہے۔
یہ بھی ہے:
تعلیم کا مسئلہ۔
معاشی ترقی کا مسئلہ۔
روزگار کا مسئلہ۔
انتظامی نمائندگی کا مسئلہ۔
سیاسی شرکت کا مسئلہ۔
اور:
ادارہ جاتی رسائی کا مسئلہ۔
لیکن اس سے ایک اور سوال پیدا ہوا:
اگر کانگریس کی قیادت والی حکومت کو مسلم پسماندگی کی سنگینی کا علم تھا تو سیاسی نمائندگی اتنی کم کیوں رہی؟
سچر کمیٹی کا سبق
سچر کمیٹی نے ایک اہم تضاد سامنے رکھا۔
مسلمان انتخابی طور پر اتنے اہم تھے کہ وہ انتخابات کے نتائج پر اثر ڈال سکتے تھے۔
لیکن متعدد طاقتور اداروں میں ان کی موجودگی ان کی آبادی کے تناسب سے بہت کم تھی۔
یہی ہندوستانی مسلم سیاست کا بنیادی مسئلہ ہے۔
ووٹ کی طاقت اور اقتدار کی طاقت ایک ہی چیز نہیں۔
حل صرف فلاحی منصوبے نہیں ہو سکتا۔
حل میں شامل ہونا چاہیے:
نمائندگی + تعلیم + روزگار + سیاسی طاقت + ادارہ جاتی رسائی۔
ورنہ ہر انتخاب مسلم سیاسی تعلق کو دوبارہ صفر سے شروع کر دیتا ہے۔
2012
4.5 فیصد ذیلی کوٹے کا تنازع
یو پی اے حکومت کی جانب سے دیگر پسماندہ طبقات کے کوٹے کے اندر اقلیتوں کے لیے 4.5 فیصد ذیلی کوٹے کی تجویز نے بڑا سیاسی تنازع پیدا کیا۔
حامیوں نے اسے پسماندہ مسلم برادریوں کی حالت بہتر بنانے کی کوشش قرار دیا۔
ناقدین نے اسے انتخابی سیاست سے متاثر اور قانونی طور پر کمزور قرار دیا۔
صورتِ حال چاہے جو بھی ہو، اس واقعے نے ایک مستقل مسئلہ سامنے رکھا:
انتخابات کے قریب اعلان کی جانے والی پالیسیاں آسانی سے انتخابی حکمتِ عملی کے طور پر دیکھی جاتی ہیں۔
اگر کانگریس مسلم اعتماد دوبارہ حاصل کرنا چاہتی ہے تو اسے عارضی انتخابی اعلانات کے بجائے طویل مدتی ادارہ جاتی پالیسی اختیار کرنی ہوگی۔
2014
سیاسی زلزلہ
2014 کے لوک سبھا انتخابات نے ہندوستانی سیاست کو بدل دیا۔
نریندر مودی کی قیادت میں بی جے پی نے لوک سبھا میں اکثریت حاصل کی۔
کانگریس کو تاریخی شکست کا سامنا کرنا پڑا۔
مسلم ووٹروں کا رجحان ان جماعتوں کی طرف مزید بڑھا جو بی جے پی کے امیدواروں کو شکست دینے کی پوزیشن میں تھیں۔
اس سے ایک تضاد پیدا ہوا:
مسلم ووٹ انتخابی طور پر زیادہ اہم ہوتا گیا، لیکن مسلم سیاسی سودے بازی کی طاقت اسی تناسب سے نہیں بڑھی۔
کوئی برادری درجنوں نشستوں کے نتائج طے کر سکتی ہے اور پھر بھی قومی فیصلہ سازی میں اس کے پاس مناسب طاقت نہ ہو۔
یہی مسلم ووٹ کا تضاد ہے۔
2014–2024
دفاعی ووٹنگ کا دور
مودی دور میں کانگریس نے خود کو بی جے پی کے اہم قومی متبادل کے طور پر پیش کیا۔
مسلمانوں کے سامنے ایک مشکل سیاسی کشمکش پیدا ہوئی۔
انتخابی انتخاب تیزی سے:
کانگریس/انڈیا بمقابلہ بی جے پی/این ڈی اے
کی صورت اختیار کرنے لگا۔
لیکن اس دو قطبی سیاست کے نیچے مسلم برادری کا اپنا آزاد سیاسی ایجنڈا اکثر دب گیا۔
بی جے پی کے ناقدین کہتے:
“ہندوتوا کو روکنے کے لیے کانگریس کو ووٹ دیجیے۔”
مسلم ووٹر کا سوال ہونا چاہیے:
“اگر کانگریس جیت گئی تو ہمارے لیے کیا بدلے گا؟”
یہ سوال آہستہ آہستہ زیادہ اہم ہوتا گیا۔
2024
اعداد و شمار ایک کہانی سناتے ہیں
2024 کے لوک سبھا انتخابات میں مسلم اراکینِ پارلیمنٹ کی تعداد 24 رہی۔
رپورٹس کے مطابق یہ لوک سبھا کا تقریباً 4.4 فیصد تھا، جبکہ ہندوستان کی آبادی میں مسلمانوں کا حصہ تقریباً 14 فیصد ہے۔
یہ حقیقت اپنے آپ میں ایک سنگین جمہوری سوال پیدا کرتی ہے:
ہندوستان کی آبادی کے تقریباً ساتویں حصے کا پارلیمنٹ میں نمائندگی اتنی کم کیوں ہے؟
اور کانگریس سے ایک دوسرا سوال بھی پوچھا جانا چاہیے:
اس نے کتنے مسلم امیدوار میدان میں اتارے؟
اور اس سے بھی زیادہ اہم:
کتنوں کو واقعی جیتنے کے قابل نشستیں دی گئیں؟
یہی اعداد و شمار اہم ہیں۔
نہ کہ مسلم ترجمانوں کی تعداد۔
نہ مسلم کانفرنسوں کی تعداد۔
نہ سیکولرازم پر کی گئی تقریروں کی تعداد۔
امیدوار۔
جیتنے کے قابل نشستیں۔
فتح۔
قیادت کے عہدے۔
یہی حقیقی نمائندگی ہے۔
2026
سیاسی انتباہ
آج کا سیاسی ماحول مسلم ووٹ کو پہلے سے کہیں زیادہ اہم بنا رہا ہے۔
حالیہ انتخابی نتائج بتاتے ہیں کہ مسلم ووٹر کانگریس کی قیادت والے اپوزیشن اتحادوں میں اہم کردار ادا کر رہے ہیں۔
اس سے ایک غیر معمولی سیاسی موقع پیدا ہوتا ہے۔
لیکن اس کے ساتھ خطرہ بھی ہے۔
کانگریس ایک مرتبہ پھر مسلم انتخابی انحصار کو مسلم سیاسی اطمینان سمجھنے کی غلطی کر سکتی ہے۔
یہ دونوں ایک چیز نہیں ہیں۔
سیاسی حساب کتاب
| مدت | کانگریس کی پوزیشن/کارروائی | مسلم سیاسی سوال |
|---|---|---|
| 1947–84 | سیکولر قوم پرستانہ سیاسی ڈھانچہ | کیا انتخابی شمولیت ادارہ جاتی نمائندگی میں تبدیل ہوئی؟ |
| 1985–86 | شاہ بانو تنازع اور قانون | کیا مسلم خواتین کو حقیقی سیاسی آواز ملی؟ |
| 1986 | بابری مسجد کے تالے کھلے | کس کو علم تھا، فیصلہ کس نے کیا اور سیاسی فائدہ کس کو ہوا؟ |
| 1989–92 | ایودھیا قومی سیاست کے مرکز میں | کیا کانگریس آئینی سیکولرازم کا کافی تحفظ کر سکی؟ |
| 1992 | بابری مسجد کی شہادت | سیاسی یقین دہانیاں ناکام کیوں ہوئیں؟ |
| 2004–14 | یو پی اے اور سچر کمیٹی | مسلم پسماندگی کے علم کے باوجود نمائندگی کم کیوں رہی؟ |
| 2012 | 4.5% اقلیتی ذیلی کوٹا | ساختی اصلاح یا انتخابی سیاست؟ |
| 2014–24 | کانگریس بی جے پی مخالف اہم متبادل بنی | کیا دفاعی مسلم ووٹنگ اقتدار میں شراکت میں تبدیل ہوئی؟ |
| 2024 | صرف 24 مسلم اراکینِ پارلیمنٹ | پارلیمنٹ میں مسلم نمائندگی اتنی کم کیوں ہے؟ |
| 2026 | کانگریس کو اب بھی اہم مسلم حمایت حاصل | کیا انتخابی انحصار بالآخر سیاسی نمائندگی میں تبدیل ہوگا؟ |
اس حساب کتاب میں بی جے پی بھی شامل ہونی چاہیے
ایک اہم بات واضح ہونی چاہیے۔
یہ تحقیق کانگریس کو ایک معیار پر رکھ کر بی جے پی کو اس سے آزاد نہیں کر سکتی۔
اگر اصول یہ ہے:
“کسی بھی جماعت کو مسلم ووٹ کی ملکیت حاصل نہیں ہے۔”
تو یہ اصول سب پر لاگو ہوگا۔
بی جے پی کو بھی مسلم نمائندگی، امیدواروں کے انتخاب، فرقہ وارانہ بیانات اور اقلیتی شرکت کے سوالات کا جواب دینا ہوگا۔
علاقائی جماعتوں کو بھی۔
مسلم سیاسی جماعتوں کو بھی۔
اور مسلم رہنماؤں کو بھی۔
کیونکہ:
سیاسی جواب دہی صرف کانگریس کے دروازے پر ختم نہیں ہو سکتی۔
سب سے بڑی ناکامی: مسلم سیاسی واسطہ کار
اس تحقیق کا شاید سب سے بے آرام کرنے والا حصہ مسلم سیاسی واسطہ کاروں سے متعلق ہے۔
دہائیوں سے سیاسی جماعتوں نے انحصار کیا ہے:
- مذہبی رہنماؤں پر،
- مسلم تنظیموں پر،
- دانشوروں پر،
- صحافیوں پر،
- مقامی سیاسی واسطہ کاروں پر،
- علماء پر،
- سیاسی درمیانی کردار ادا کرنے والوں پر،
- اور خود ساختہ مسلم نمائندوں پر۔
ان میں سے بہت سے لوگوں نے حکومتوں کے ساتھ مذاکرات کیے اور دعویٰ کیا کہ وہ مسلمانوں کی جانب سے بات کر رہے ہیں۔
لیکن سوال یہ ہے:
انہوں نے کیا مذاکرات کیے؟
کیا حاصل کیا؟
کیا چھوڑا؟
انہیں یہ اختیار کس نے دیا تھا؟
وہ کس کے سامنے جواب دہ تھے؟
مسلمان اگر کانگریس سے جواب دہی کا مطالبہ کرتے ہیں تو انہیں اپنے نمائندوں کو جواب دہی سے مستثنیٰ نہیں رکھنا چاہیے۔
نیا سیاسی اصول
لہٰذا مسلم سیاسی چارٹر میں ایک عالمگیر اصول ہونا چاہیے:
کوئی بھی شخص محض اس لیے ہندوستانی مسلمانوں کا نمائندہ نہیں بن سکتا کہ کسی سیاسی جماعت، مذہبی تنظیم یا ٹیلی ویژن چینل نے اسے پلیٹ فارم فراہم کر دیا ہے۔
نمائندگی ثابت ہونی چاہیے۔
حمایت ثابت ہونی چاہیے۔
نتائج ثابت ہونے چاہئیں۔
2026 میں کانگریس سے مطالبہ
کانگریس کو اب باقاعدہ “مسلم نمائندگی وائٹ پیپر” جاری کرنا چاہیے۔
اس میں یہ معلومات ہونی چاہئیں:
A۔ امیدواروں کے اعداد و شمار
ہر لوک سبھا انتخابات میں کتنے مسلم امیدواروں کو ٹکٹ دیا گیا؟
B۔ جیتنے کا امکان
کتنے امیدواروں کو ایسی نشستوں سے کھڑا کیا گیا جہاں واقعی کامیابی کا امکان تھا؟
C۔ پارلیمنٹ
کانگریس کے ٹکٹ پر کتنے مسلم اراکینِ پارلیمنٹ منتخب ہوئے؟
D۔ تنظیم
قومی اور ریاستی سطح پر کتنے مسلمان فیصلہ ساز عہدوں پر ہیں؟
E۔ حکومت
کانگریس کی قیادت والی حکومتوں میں کتنے مسلمان وزیر بنے؟
F۔ پالیسی
مسلم سماجی و اقتصادی ترقی کے لیے کون سی قابلِ پیمائش پالیسیاں نافذ کی گئیں؟
G۔ جواب دہی
کانگریس کے وعدوں کا جائزہ لینے کے لیے مسلم شہریوں کے پاس کون سا ادارہ جاتی طریقہ موجود ہے؟
اگر کانگریس یہ اعداد و شمار ایمانداری سے شائع کرتی ہے تو سیاسی اعتماد دوبارہ قائم ہونا شروع ہو سکتا ہے۔
اگر وہ ایسا کرنے سے انکار کرتی ہے تو یہ انکار بھی سیاسی طور پر اہم ہوگا۔
مسلم ووٹر کی جوابی پیشکش
مسلم برادری کو بھی اپنا سیاسی معاہدہ پیش کرنا چاہیے۔
یہ نہیں:
“ہمیں تحفظ دیجیے اور ہم آپ کو ووٹ دیں گے۔”
بلکہ:
“ہمیں نمائندگی، آئینی تحفظ اور جواب دہ اقتدار میں شراکت دیجیے—ہم آپ کی سیاسی پیشکش پر اپنے ضمیر کے مطابق غور کریں گے۔”
یہی ایک بالغ جمہوری تعلق ہے۔
سب سے اہم فرق
مقصد ہندوستان کے اندر کوئی الگ مسلم سیاسی نظام قائم کرنا نہیں ہے۔
مقصد اس کے بالکل برعکس ہے۔
مقصد ہندوستانی مسلمانوں کو ہندوستانی آئینی نظام کا مکمل اور مؤثر شریک بنانا ہے۔
اس کا مطلب ہے:
مساوی شہریت۔
مساوی تحفظ۔
مساوی مواقع۔
بامعنی نمائندگی۔
سیاسی وقار۔
مطالبہ یہ نہیں ہے:
“مسلمانوں کو خصوصی سہولت دو کیونکہ وہ مسلمان ہیں۔”
مطالبہ یہ ہے:
“جب ووٹ چاہیے تو مسلمانوں کو شہری سمجھیں اور جب اقتدار تقسیم کرنے کی بات ہو تو انہیں صرف اقلیت کہہ کر کنارے نہ کریں۔”
آخری سیاسی آڈٹ
تقریباً آٹھ دہائیوں کے ہندوستانی جمہوری سفر کے بعد مسلم سوال اب یہ نہیں ہونا چاہیے:
“کیا کانگریس سیکولر ہے؟”
یہ سوال بہت آسان ہے۔
مشکل سوال یہ ہیں:
کانگریس حقیقتاً کتنے مسلمانوں کو بااختیار بناتی ہے؟
کتنے مسلم امیدواروں کو جیتنے کے قابل نشستیں ملتی ہیں؟
کتنے مسلمان فیصلہ ساز اداروں میں موجود ہیں؟
کانگریس کے ذریعے کتنے مسلمان حکومت تک پہنچتے ہیں؟
کانگریس حقیقتاً کتنی سیاسی طاقت بانٹنے کے لیے تیار ہے؟
اور آخر میں:
انتخابات ختم ہونے کے بعد مسلم ووٹر کے ساتھ کیا ہوتا ہے؟
ان سوالات کا جواب صرف راہل گاندھی کی تقریروں سے نہیں دیا جا سکتا۔
نریندر مودی کی تقریروں سے بھی نہیں۔
کسی عرفان سے نہیں۔
کسی مولانا سے نہیں۔
کسی ٹیلی ویژن ترجمان سے نہیں۔
کسی سیاسی واسطہ کار سے نہیں۔
جواب صرف اعداد و شمار، دستاویزات، اداروں اور نتائج سے دیا جا سکتا ہے۔
اس حساب کتاب کا فیصلہ
دستیاب تاریخی ریکارڈ یہ ثابت نہیں کرتا کہ کانگریس ہمیشہ مسلمانوں کی مخالف رہی ہے۔
لیکن یہ بھی ثابت نہیں کرتا کہ کانگریس نے مسلسل مسلمانوں کو حقیقی سیاسی طاقت فراہم کی ہے۔
تاریخ کہیں زیادہ پیچیدہ ہے۔
کانگریس نے اہم مواقع پر سیکولر آئینی نظام کا دفاع کیا ہے۔
اس نے ایسے فیصلے بھی کیے جن سے مسلمانوں میں گہرا عدم اعتماد پیدا ہوا۔
اس نے مسلم پسماندگی کو تسلیم کرنے کے لیے پروگرام بنائے۔
پھر بھی سیاسی نمائندگی ناکافی رہی۔
اس نے بی جے پی کی مخالفت کی۔
لیکن بی جے پی مخالف سیاست کو خود بخود مسلم بااختیاری کا متبادل نہیں سمجھا جا سکتا۔
یہی اس سیاسی آڈٹ کا مرکزی نتیجہ ہے۔
بعض انتخابی حلقوں میں بی جے پی کو شکست دینے کے لیے کانگریس ایک ضروری سیاسی ذریعہ ہو سکتی ہے۔
لیکن اس سے کانگریس کو مسلم ووٹ کی مستقل ملکیت حاصل نہیں ہو جاتی۔
مسلم ووٹر کو اب تبدیلی لانا ہوگی:
وفاداری سے جواب دہی کی طرف۔
خوف سے مذاکرات کی طرف۔
علامتی نمائندگی سے حقیقی نمائندگی کی طرف۔
ووٹ بینک سے اقتدار کے شریک کی طرف۔
اور ہر سیاسی جماعت کے لیے پیغام ایک ہونا چاہیے:
مسلم ووٹر سے صرف یہ نہ پوچھیں کہ وہ کس سے ڈرتا ہے۔
اس سے پوچھیں کہ وہ کیا چاہتا ہے۔
اور اگر اس کا ووٹ چاہیے تو اقتدار میں حقیقی شراکت کے لیے تیار رہیے۔
مسلم ووٹ کسی کا بلینک چیک نہیں ہے۔
یہ ایک سیاسی معاہدہ ہے۔
اور 2026 میں ووٹر اس معاہدے کی ہر شرط پڑھ رہا ہے۔
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